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________________ २८८ जयधवला सहिदे कसायपाहुडे ९ २६६. पयडिविसेसवसेण विसेसाहियत्तमेत्थ दट्ठव्वं । * सोगे जहणणपदेससंकमो विसेसाहियो । § २६७. कुदो ? पुव्विल्लबंधगद्धादो संखेज्जगुणबंधगद्धाए संचिददव्त्रानुसारेण संकमपवृत्ति अन्भुवगमादो । * अरदीए जहण्णपदेससंकमो संखेज्जगुणो । २६८. पडिविसेसमेत मेत्थ कारणं । * एवं सयवेदे जहणपदेससंकमो विसेसाहियो । २६. केत्तियमेत्तेण १ इत्थिपु रिसवेदबंधगद्धापरिसुद्धहस्सर दिबंधगद्धा पडिबद्धसंचयमेत्तेण । * दुर्गुछाए जहण्णपदेससंकमो विसे साहियो । ३००. त्तियमेत्ते ? इत्थपुरिसवेदबंधगद्धासंचयमेत्तेण । * भए जहणणपदेस संकमो विसेसाहिओ । ९ ३०१. केत्तियमेत्तो विसेसो ? पयडिविसेसमेत्तो । * माणसंजलणे जहण्णपदेससंकमो विसेसाहिओ । ९ ३०२. केत्तियमेत्तो विसेसो ? चउन्भागमेत्तो । * कोहे जहणपदेससंकमो विसेसाहित्र । [ बंधगो ६ § २६६. प्रकृति विशेष होनेके कारण यहाँ पर विशेष अधिकपना जान लेना चाहिए । * उससे शोकका जघन्य प्रदेशसंक्रम संख्यातगुणा है । २७. क्योंकि पूर्व प्रकृतिके बन्धक कालसे संख्यातगुणे बन्धक कालमें सञ्चित हुए द्रव्यके अनुसार संक्रमकी प्रवृत्ति स्वीकार की गई है । * उससे अरतिका जघन्य प्रदेशसंक्रम विशेष अधिक है । ६ २६८. प्रकृति विशेषमात्र यहाँ पर कारण है । * उससे पुरुषवेदका जघन्य प्रदेशसंक्रम विशेष अधिक है । § २६६. कितना अधिक है ? स्त्रीवेद और पुरुषवेदके बन्धककालसे न्यून हास्य रतिके बन्धक कालके भीतर जितना सञ्चय होता है उतना अधिक है । * उससे जुगुप्साका जघन्य प्रदेशसंक्रम विशेष अधिक है । ३००. कितना अधिक है ? स्त्रीवेद-पुरुषवेदके बन्धककालमें हुआ सयमात्र अधिक है । * उससे भयका जघन्य प्रदेशसंक्रम विशेष अधिक है । ३०१. विशेषका प्रमाण कितना है ? प्रकृतिविशेषमात्र विशेषका प्रमाण * उससे मान संज्वलनका जघन्य प्रदेशसंक्रम विशेष अधिक है । ६ ३०२. विशेषका प्रमाण कितना है ? चतुर्थ भागमात्र विशेषका प्रमाण है । * उससे क्रोधसंज्वलनका जघन्य प्रदेशसंक्रम विशेष अधिक है । है 1
SR No.090221
Book TitleKasaypahudam Part 09
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size19 MB
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