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________________ जयधवला सहिदे कसायपाहुडे [ बंधगो ६ २६४ जह० खुद्दाभव० समऊणं । एवं जाव० । ६२०२. अंतरं दुहिं- - जह० उक्क० । उक्कस्से पयदं । दुविहो गि० - ओघे० आदे० । ओघेण सत्रपडी० उक० पदे० संका० जह० एयसमओ उक्क० अनंतकालमसं खेज्जा पोग्गल परियट्टा । अणुक० णस्थि अंतरं । एवं चदुसु, गदीसु । णवरि मणुस अपज्ज० अणुक० जह० एयस० । उक्क० पलिदो० असंखे० भागो । एवं जाव० । ६ २०३. एवं जहण्यं पि खेदव्यं । णारि ओघे तिग्निसंजल० पुरिस० जह० एयसमओ उक्क० सेढीए असंखे० भागो । एवं मणुसतिए । णवरि मरणुसिणी ० पुरिस ० उकस्सभंगो । सोलह कषाय, भय और जुगुप्सा के जघन्य प्रदेशों के संक्रामक जीवोंका जघन्य काल एक समय कम चुल्लक भवग्रहणप्रमाण है । इसी प्रकार अनाहारक मार्गणा तक ले जाना चाहिए । विशेषार्थ - - मनुष्य पर्याप्तकों सोलह कषाय, भय और जुगुप्साका जघन्य प्रदेशसंक्रम भव प्रथम समय में होता है. इसलिए इनमें इनके जघन्य प्रदेशों के संक्रामक जीवोंका जघन्य काल एक समय कम क्षुल्लक भवग्रहप्रमाण कहा है। शेष कथन स्पष्ट ही है । २०२. अन्तर दो कारका है - जवन्य और उत्कृष्ट । उत्कृष्टका प्रकरण है । निर्देश दो प्रकारका है - और आदेश । श्रघसे सब प्रकृतियोंके उत्कृष्ट प्रदेशों के संक्रामक जीवोंका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर अनन्त काल है जो असंख्यात पुद्गल परिवर्तनप्रमाण है । अनुत्कृष्ट प्रदेशों के संक्रामक जीवोंका अन्तरकाल नहीं हैं। इसी प्रकार चारों गतियोंमें जानना चाहिए। इतनी विशेषता है कि मनुष्य अपर्याप्तकों में अनुत्कृष्ट प्रदेशों के संक्रामक जीवोंका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर पल्यके असंख्यातवें भागप्रमाणए है । इसी प्रकार अनाहारक मार्गणा तक ले जाना चाहिए । २०३. इसी प्रकार जघन्य प्रदेशसंक्रामकों के अन्तरकालको भी जानना चाहिए। इतनी विशेषता है कि ओघसे तीन संज्वलन और पुरुषवेदका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर श्रेणी असंख्यातवें भागप्रमाण है । इसी प्रकार मनुष्यत्रिकमें जानना चाहिए । इतनी विशेषता है कि मनुष्यिनियों में पुरुषवेदका भङ्ग उत्कृष्टके समान हैं । विशेषार्थ — ओघसे नाना जीव सब प्रकृतियोंके उत्कृष्ट प्रदेशोंके संक्रामक एक समय के अन्तरसे हों वह तो सम्भव है ही । साथ ही गुणित कर्माशिक जीवोंके उत्कृष्ट अन्तरकालको देखते हुए वे अनन्तकाल तक न हों यह भी सम्भव है, इसलिए इनके उत्कृष्ट प्रदेशोंके संक्रामक जीवोंका जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर अनन्त काल कहा है । इनके अनुत्कृष्ट प्रदेशोंके संक्रामक जीवोंका अन्तरकाल नहीं है यह स्पष्ट ही है । चारों गतियाँ निरन्तर मार्गणाएँ होनेसे उनमें भी यह अन्तरकाल बन जाता है। इसलिए उनमें श्रधके समान जाननेकी सूचना की है । मात्र मनुष्य पर्याप्त सान्तर मार्गणा है, इसलिए उनमें उक्त मार्गणा के अन्तरकालके अनुसार सब प्रकृतियोंके अनुत्कृष्ट प्रदेशों के संक्रामक जीवोंका जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर काल कहा है । यहाँ पर उत्कृष्ट की अपेक्षा जिस प्रकार विचार किया है उसी प्रकार जघन्यकी अपेक्षा भी विचार कर लेना चाहिए । जो इसमें विशेषता है उसका अलग से निर्देश कर दिया है ।
SR No.090221
Book TitleKasaypahudam Part 09
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size19 MB
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