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________________ गा०५८] उत्तरपयडिपदेससंकमे परिमाणं २५३ ६ १८५. जहण्णए पयदं । दुविहो णिदेसो-ओघे० आदेसे० । ओघे० मिच्छ०सम्म०-सम्मामि० जह० पदे०संका० केत्ति ? संखेजा। अजह० केत्ति० १ असंखे० । सोलसक०-णवणोक० जह० पदे०संका० केत्ति ? संखेजा। अजह० केत्ति० ? अणंता । एवं तिरिक्खा ।। १८६. आदेसेण णेरइय० सव्यपयडी० जह० केत्ति० ? संखेजा। अजह ० केत्ति ? असंखेज्जा । एवं सव्यणेरइय०-सव्यपंचिंदिय-तिरिक्ख-मणुसअपज०-देवगइदेव भवणादि जाव अबराइद त्ति । मणुसेसु मिच्छ० जह० अजह० पदे०संका० केत्ति० ? संखेजा । सेसकम्माणं जह० संखेजा। अजह० केत्ति ? असंखेजा। मणुसपज०मणुसिणी० सचट्ठदेवा सव्वपयडी जह० अजह० पदे०संका० केत्ति० ? संखेजा। एवं जाव० । ६१८७. खेत्तं दुविहं-जह० उक्क० च । उक्कस्से पयदं । दुविहो णि०-ओघे० आदेसे० । ओघेण दंसणतिय उक्क० अणुक्क० पदे०संका० लोगस्स असंखे०भागे । सोलसक०-णवणोक० उक्क० पदे०संका० लोगस्स असंखे भागे। अणुक्क० सव्वलोगे । एवं तिरिक्खेसु । सेसगइमग्गणासु सव्वपयडी उक० अणुक्क० पदे०संका० लोग० असंखे०भागे । एवं जाव० । एवं जहण्णयं पिणेदव्वं । १५. जघन्यका प्रकरण है। निर्देश दो प्रकारका है-ओघ और आदेश । ओघसे मिथ्यात्व, सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वके जघन्य प्रदेशोंके संक्रामक जीव कितने हैं ? संख्यात हैं। अजघन्य प्रदेशोंके संक्रामक जीव कितने हैं ? असंख्यात हैं। सोलह कषाय और नौ नोकषायोंके जघन्य प्रदेशोंके संक्रामक जीव कितने हैं ? संख्यात हैं। अजघन्य प्रदेशोंके संक्रामक जीव कितने हैं ? अनन्त हैं । इसी प्रकार सामान्य तिर्यञ्चोंमें जानना चाहिए। १८६. आदेशसे नारकियोंमें सब प्रकृतियोंके जघन्य प्रदेशोंके संक्रामक जीव कितने हैं ? संख्यात हैं। अजघन्य प्रकृतियोंके संक्रामक जीव कितने हैं ? असंख्यात हैं। इसी प्रकार सब नारकी, वेन्द्रिय तिन, मनष्य अपर्याप्त देवगतिमें सामान्य देव और भवनवासियोंसे लेकर अपराजित विमान तकके देवोंमें जानना चाहिए। मनुष्योंमें मिथ्यात्वके जघन्य और अजघन्य प्रदेशोंके संक्रामक जीव कितने हैं ? संख्यात हैं। शेष कर्मो के जघन्य प्रदेशोंके संक्रामक जीव संख्यात हैं । अजघन्य प्रदेशोंके संक्रामक जीव कितने हैं ? असंख्यात हैं। मनुष्यपर्याप्त, मनुष्यिनी और सर्वार्थसिद्धिके देवोंमें सब प्रकृतियोंके जघन्य और अजघन्य प्रदेशोंके संक्रामक जीव कितने हैं ? संख्यात हैं। इसी प्रकार अनाहारक मार्णण तक ले जाना चाहिए। . , ६ १८७. क्षेत्र दो प्रकारका है-जघन्य और उत्कृष्ट । उत्कृष्टका प्रकरण है। निर्देश दो प्रकारका है-ओघ और आदेश। ओघसे दर्शनमोहनीयत्रिकके उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशोंके संक्रामक जीवों का क्षेत्र कितना है ? लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण है। सोलह कषाय और नौ नोकषायोंके उत्कृष्ट प्रदेशोंके संक्रामक जीवोंका क्षेत्र लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण है तथा अनुत्कृष्ट प्रदेशोंके संक्रामक जीवोंका क्षेत्र सर्व लोक है । इसी प्रकार सामान्य तिर्यश्चोंमें जानना चाहिए। गतिसम्बन्धी शेष मार्गणाओंमें सब प्रकृतियोंके उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट प्रदेशोंके संक्रामक जीवोंका क्षेत्र लोकके व भागप्रमाण है। इसी प्रकार अनाहारक मागणा तक जानना चाहिए। तथा इसी प्रकार जघन्य क्षेत्रको भी ले जाना चाहिए। सब पड़
SR No.090221
Book TitleKasaypahudam Part 09
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size19 MB
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