SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 250
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ गा० ५८ ] उत्तरपयडिपदेस कमे एयजीवेण अंतरं २२३ भय - दुगु छ० - पुरिसवे ० । णवरि अजह० जह० जहण्णट्ठिदी समयूणा । अनंता ०४ हस्स - रदि - अरदि- सोग० जह० पदे ० संका० जहष्णु० एयस० । अजह० जह० अंतोमुहुतं, उक्क० सगट्टिदी | णवरि सव्त्रट्ठे इत्थिवे ० - णवुंसवे ० - मिच्छ० - सम्मामि० सगदी समयूणा । एवं जाव० । 0 अजह० एवं कालागमो समत्तो । * अंतरं । १०६. सुगममेदमहियारसंभाल गवक' । * सव्वेसिं कम्माणमुक्कस्सपदेससंकामयस्स पत्थि अंतरं । जानना चाहिए। तथा इसी प्रकार बारह कषाय, भय, जुगुप्सा और पुरुषवेदका जानना चाहिए । इतनी विशेषता है कि इनके जघन्य प्रदेशसंक्रामकका जघन्य काल एक समय कम जवन्य स्थितिप्रमाण है । अनन्तानुथन्धीचतुष्क, हास्य, रति, अरति और शोकके जघन्य प्रदेशसंक्रामकका जघन्य और उत्कृष्ट काल एक समय है। अजघन्य प्रदेशसंक्रामकका जघन्य काल अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट काल अपनी अपनी स्थितिप्रमाण है । इतनी विशेषता है कि सर्वार्थसिद्धि में स्त्रीवेद, नपुंसकवेद, मिथ्यात्व और सम्यग्मिथ्यात्व के अजघन्य प्रदेशसंक्रामकका जघन्य काल एक समय कम अपनी स्थितिप्रमाण है । इसी प्रकार अनाहारक मार्गणा जानना चाहिए । विशेषार्थ — अनुदिश आदिमें मिथ्यात्व और सम्यग्मिध्यात्वका जघन्य प्रदेशसंक्रम दीर्घ युवालोंमें वहाँसे निकलने के अन्तिम समयमें होता है, इसलिए इनमें उक्त प्रकृतियोंके अजघन्य प्रदेशसंक्रमका जघन्य काल अपनी अपनी जघन्य स्थितिप्रमाण और उत्कृष्ट काल उत्कृष्ट स्थितिप्रमाण कहा है। स्त्रीवेद और नपुंसकवेद के अजघन्य प्रदेशसंक्रमका जघन्य काल जघन्य स्थिति - प्रमाण और उत्कृष्ट काल उत्कृष्ट स्थितिप्रमाण इसी प्रकार घटित कर लेना चाहिए। बारह कषाय, पुरुषवेद, भय और जुगुप्साका जघन्य प्रदेशसंक्रम भवके प्रथम समय में ऐसे जीवोंके भी होता है जो जघन्य यु लेकर वहाँ पर उत्पन्न हुए हैं, इसलिए इनमें उक्त प्रकृतियोंके जघन्य प्रदेशसंक्रमका जघन्य काल एक समय कम जघन्य स्थितिप्रमाण विशेष रूपसे कहा है । उत्कृष्ट काल उत्कृष्ट स्थितिप्रमाण है यह स्पष्ट ही है । इन देवोंमें अनन्तानुबन्धीचतुष्कका अजघन्य प्रदेशसंक्रम अन्तमुहूर्त तक होकर उनकी विसंयोजना होना सम्भव है । तथा वेदक सम्यग्दृष्टिके जीवन भर इनका अजघन्य प्रदेशसंक्रम होता रहता है, इसलिए तो इनके अजघन्य प्रदेशसंक्रमका जघन्य काल अन्तमुहूर्त और उत्कृष्ट काल उत्कृष्ट स्थितिप्रमाण कहा है। अब रहीं चार नोकषाय प्रकृतियाँ सो इनका जघन्य प्रदेशसंक्रम वहाँ उत्पन्न होनेके अन्तमुहूत बाद होना सम्भव है, इसलिए इनके भी श्रजघन्य प्रदेशसंक्रमका जघन्य काल अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट काल उत्कृष्ट स्थितिप्रमाण कहा है। सर्वार्थसिद्धिमें यह काल इसी प्रकार घटित हो जाता है । मात्र वहाँ जघन्य और उत्कृष्ट स्थितिका भेद नहीं होनेसे मिथ्यात्व, सम्यग्मिथ्यात्व, स्त्रीवेद और नपुंसकवेद के अजघन्य प्रदेशसंक्रमका जघन्य काल एक समय कम रिथतिप्रमाण और उत्कृष्ट काल अपनी स्थितिप्रमाण प्राप्त होने से से अलग से कहा है । शेष कथन स्पष्ट है । इस प्रकार कालानुगम समाप्त हुआ । * अव अन्तरका कथन करते हैं। १०६. अधिकार की सम्हाल करनेवाला यह सूत्र सुगम है । * सब कर्मोके उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रामकका अन्तरकोल नहीं है ।
SR No.090221
Book TitleKasaypahudam Part 09
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size19 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy