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________________ १८४ जयधवलास कसायपहिदेाहुडे * इत्थवेदस्स उक्कस्सओ पदेस संकमो कस्स ? ४५. सुगमं । * गुणिदकम्मंसिो असंखेज्जवस्साउएस इत्थिवेदं पूरेण तदो कमेण पूरिदकम्मंसिओ खवणाए ऋभुडिदो, तदो चरिमट्ठिदिखंडयं चरिमसमयसंछुहमाण्यस्स तस्स इत्थिवेदस्स उक्कस्सओ पदेससंकमो । ६ ४६. एदस्स सुत्तस्स अत्थो बुच्चदे । तं जहा — गुणिदकम्मंसिओ पलिदोवमस्सासंखेज्जदिभागमेत्तकालेणूणियं कम्मट्ठिदिं बादरपुढविजीवेसु तसकाइएसु च समयाविरोहेणाणुपालेऊण तदो असंखेज्जवस्साउएस पलिदोवमस्सासंखेज्जदिभागमेत्ताउट्ठदीए समुप्पजिऊण तत्थ बुंसयवेदबंधवोच्छेदं काढूण तत्थ बंधगद्धाए संखेज्जे भागे इत्थिवेदबंधगद्धं पवेसिय बंधगद्धामाहप्पेणित्थिवेददव्त्रं पूरेमाणो गच्छदि जाव सगाउट्ठदिचरिमसमयो त्ति । एवमित्थि - वेददव्त्रमुक्कस्सं करिय तत्थेव कम्मट्ठिदिं समानिय तत्तो णिस्सरिऊण दसवस्ससहस्साउएसु देवेो । तत्थ · सम्मत्तं घेत्तण सगाउट्ठदिमणुपा लिय तत्तो चुदो मणुसेसुववण्णो । एवमित्थिवेदं पूरेदूण मणुसेसुववण्णस्स खवयचरिमफालीए सामित्तविहाणङ्कमिदं वयणं—'तदो कमेण पूरिदकम्मंसिओ' इच्चादि । एत्थ संचयागुगमे विहत्तिभंगो । वरि दिवड गुणहाणीणं संखेज्जाभागमेत्तित्थिवेदुकस्ससंचयदव्त्रं थोवूणमेत्थ सामित्तविसयीकयदव्यमिदि घेत्तव्यं, [ बंधगो ६ * स्त्रीवेदका उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रम किसके होता है ? ९४५. यह सूत्र सुगम है । * कोई गुगितकर्माशिक जीव असंख्यात वर्षकी आयुवालों में स्त्रीवेदको पूरण करके अनन्तर क्रमसे पूरित कर्माशिक होकर क्षपणाके लिए उद्यत हुआ । अनन्तर अन्तिम स्थिति - arusrat अन्तिम समयमें संक्रमित करनेवाले उस जीवके स्त्रीवेदका उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रम होता है । ४६. अब इस सूत्र अर्थ कहते हैं । यथा - कोई एक गुणितकर्मशिक जीव पल्यके असंख्यातवें भागप्रमाण कालसे न्यून कर्मस्थितिप्रमाण कालको बादर पृथिवी जीवोंमें और त्रसकायिकोंमें समय के अविरोधपूर्वक बिताकर अनन्तर असंख्यात वर्ष की आयुवालोंमें, पल्यके श्रसंख्यातवें भागप्रमाणास्थिति के साथ उत्पन्न होकर पश्चात् वहाँ पर नपुंसकवेदकी बन्धव्युच्छित्ति करके तथा उस बन्धककालके संख्यात बहुभागको स्त्रीवेद के बन्धककाल में प्रवेश करा के बन्धककाल के माहात्म्यवश स्त्रीवेदकेद्रव्यको पूरण करता हुआ अपनी आयुस्थितिके अन्तिम समयको प्राप्त होता है। इस प्रकार स्त्रीवेदके द्रव्यको उत्कृष्ट करके और वहीं पर कर्मस्थितिको समाप्तकर वहाँसे निकल कर दस हजार वर्षकी युवाले देवोंमें उत्पन्न हुआ । पश्चात् वहाँ पर सम्यक्त्वको ग्रहणकर और अपनी आयुस्थितिका पालनकर वहाँसे च्युत होकर मनुष्यों में उत्पन्न हुआ । इस प्रकार स्त्रीवेदको पूर करके मनुष्योंमें उत्पन्न हुए उस जीवके क्षपकसम्बन्धी स्त्रीवेदकी अन्तिम फालिमें स्वामित्वका विधान करनेके लिए यह वचन आया है - 'तदो कमेण पूरिदकम्मंसिओ' इत्यादि । यहाँ पर सयका अनुगम करने पर उसका भङ्ग अनुभागविभक्तिके समान है । इतनी विशेषता है कि डेढ़ गुणहानियोंके कुछ कम संख्यात बहुभागप्रमाण स्त्रीवेदका उत्कृष्ट सञ्चयद्रव्य यहाँ पर स्वामित्वका विषय
SR No.090221
Book TitleKasaypahudam Part 09
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size19 MB
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