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________________ [18] सर्वसंक्रम-सब कर्मपरमाणुओंका एकसाथ संक्रममा नाम सर्वसंक्रम है। यह उद्वेलना, विसंयोजना और क्षपणामें अन्तिम काण्डकी अन्तिम फालिके पतनके समय होता है। इसके भागहारका प्रमाण एक है। अल्पबहुत्व-इन पाँचौं संक्रमोंके अल्पबहुत्वका निर्देश करते हुए बतलाया है कि उद्वेलनासंक्रममें कर्मपरमाणु सबसे स्तोक होते हैं, उनसे विध्यातसंक्रममें असंख्यातगुणे होते हैं, उनसे अधःप्रवृत्तसंक्रममें असंख्यातगुणे होते है, उनसे गुणसंक्रममें असंख्यातगुणे होते हैं और उनसे सर्वसंक्रममें असंख्यातगुणे होते हैं। कारणका निर्देश करते हुए वहाँ बतलाया है कि इन पाँचों संक्रमोंका भागहार उत्तरोत्तर असंख्यातगुणा हीन होता है। यही कारण है कि इन संक्रमोंमें उत्तरोत्तर असंख्यातगुणा द्रव्य प्राप्त होता है। " भागाभाग- श्रागे उत्तरप्रकृतिप्रदेशसंक्रमका कथन समुत्कीर्तना श्रादि २४ अनुयोगद्वारों तथा भुजगार, पदनिक्षेप, वृद्धि और स्थानके श्राश्रयसे किया जायगा यह बतलाफर २४ अनुयोगद्वारोंके मध्य भागाभागके जीवविषयक भागाभाग और प्रदेशविषयक भागाभाग ऐसे दो भेद करके स्वस्थान भागाभागका व्याख्यान करते हुए बतलाया है कि मिथ्यात्वके द्रव्यके असंख्यात भाग करने पर उनमेंसे बहुभाग सर्वसंक्रमका द्रव्य है। शेष एक भागके असंख्यात भाग करने पर बहुभाग गुणसंक्रमका द्रव्य है । शेष एक भाग विध्यात संक्रमका द्रव्य है। इस प्रकार मिथ्यात्व प्रकृतिके प्रदेशोंके सर्वसंक्रम, गुणसंक्रम और विध्यातसंक्रम ये तीन संक्रम ही होते हैं, अन्य दो संक्रम नहीं होते। कारण कि मिथ्यात्व उदलना प्रकृति न होनेसे इसका उद्वलना संक्रम सम्भव नहीं है और सम्यक्त्व तथा सम्यग्मिथ्यात्व बन्धप्रकृति न होनेसे मिथ्यात्वका अधःप्रवृत्तसंक्रम भी सम्भव नहीं है। ____सम्यक्त्वप्रकृतिके द्रव्यके असंख्यात भाग करने पर उनमेंसे बहुभाग अधःप्रवृत्त संक्रमका द्रव्य है, शेष एक भागके असंख्यात बहुभाग करने पर उनमेंसे बहुभाग सर्वसंक्रमका द्रव्य है, शेष एक भागके असंख्यात भाग करने पर उनमेंसे बहुभाग गुणसंक्रमका द्रव्य है तथा शेष एक भाग उद्वलना संक्रमका द्रव्य है। इस प्रकार सम्यक्त्व प्रकृतिके प्रदेशोंके उक्त चार संक्रम ही होते हैं, विध्यातसंक्रम नहीं होता, क्योंकि सम्यग्दृष्टि जीवके सम्यक्त्व प्रकृति मात्र प्रतिग्रहप्रकृति है, संक्रमप्रकृति नहीं है। और विध्यात संक्रम सम्यग्दर्शनरूप अवस्थामें ही. उपलब्ध होता है, इसलिए सम्यक्त्व प्रकृतिमें विध्यातसंक्रमका विधान नहीं किया है। सम्यग्मिथ्यात्वके द्रव्यके असंख्यात भाग करने पर उनमेंसेब सर्वसंक्रमका द्रव्य है। शेष एक भागके असंख्यात भाग करने पर उनमेंसे बहुभाग गुणसंक्रमका द्रव्य है। शेष एक भागके असंख्यात भाग करने पर उनमेंसे बहुभाग अधःप्रवृतसंक्रमका द्रव्य है, शेष एक भागके असंख्यात भाग करने पर उनमेंसे बहुभाग विध्यातसंक्रमका द्रव्य है तथा शेष एक भाग उद्वेलनासंक्रमका द्रव्य है। यहाँ पाँचों संक्रम बतलाये है। कारण यह है कि सम्यग्दृष्टि जीवके सम्यग्मिथ्यात्व प्रकृति मिथ्यात्वकी अपेक्षा प्रतिग्रह प्रकृति है और सम्यक्त्व प्रकृतिकी अपेक्षा संक्रमप्रकृति है, इसलिए इसका विध्यातसंक्रम बन जानेसे इसके पाँचों संक्रम होनेका निर्देश किया है। बारह कषाय, स्त्रीवेद, नपुंसकवेद, पति और शोक इन प्रकतियोंके संक्रमोंका कथन भी इसी प्रकार करना चाहिए। मात्र इन प्रकतियोंका उद्वेलना संक्रम नहीं होता। पुरुषवेद, क्रोधसंज्वलन, मानसंज्वलन और मायासंज्वलन इन प्रकृतियों के अपने अपने द्रव्यके असंख्यात भाग करके उनमेंसे बहभाग सर्वसंक्रमका द्रव्य है। शेष एक भाग अधःप्रवृत्तसंक्रमका द्रव्य है।
SR No.090221
Book TitleKasaypahudam Part 09
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size19 MB
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