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________________ १७५ गा०५८] उत्तरपयडिपदेससंकमे सत्थाणभागाभागो गुणसंकमदव्वं होइ । सेसेयभागमेत्तमुव्वेलणसंकमदव्वं होइ । सम्मामिच्छत्तदव्यमसंखेज्जाणि खंडाणि कादण तत्थ बहुभागा सव्वसंकमदव्वं होइ । सेसमसंखेजाणि खंडाणि कादण तत्थ वहुखंडपमाणं गुणसंकमदच होइ । सेसमसंखे०खंडाणि कादूण तत्थ बहुभागा अधापवत्तसंकमदव्य होइ। सेसमसंखे०खंडाणि कादूण तत्थ बहुभागा विज्झादसंकमदब्य होइ । सेसेयभागमेत्तमुव्वेल्लगसंकमदव्य होइ । एवं बारसक०-इत्थि-णवंसयवेदारइ-सोगाणं । णवरि उव्वेल्लणसंकमो णत्थि। पुरिसवेद-कोह-माण-मायासंजलणाणमप्पप्पणो दबमसंखेजखंडाणि कादण तत्थ बहुभागा सव्वसंकमद होइ । सेसेयखंडपमाणमधापवत्तसंकमदम्ब होइ । हस्स-रइ-भय-दुगुंछाणमप्पप्पणो दबमसंखेजखंडाणि कादण तत्थ बहुखंडपमाणं सब्यसंकमदव्य होइ । सेसमसंखेजाणि खंडाणि कादूण तत्थ बहुखंडपमाणं गुणसंकमदव्य होइ । सेसेयभागमेत्तमधापवत्तसंकमद होइ । लोहसंजलणस्स णत्थि भागाभागविहाणं । किं कारणं ? एगो चेव अधापवत्तसंकमो ति । एवं मणुसतिए। आदेसभागाभागो जहण्णभागाभागो च जाणिदूण णेदव्यो । तदो पदेसभागाभागो समत्तो । २४. सव्वसंकमणोसव्वसंकमो ति दुविहो णिद्दे सो-ओघेण आदेसेण य । ओघेण सव्वपयडीणं सव्वुक्कस्सयं पदेसग्गं संकममाणयस्स सव्वसंकमो । तदूर्ण संकामेमाणस्स णोसव्वसंकमो । एवं जाव० । करके उनमेंसे बहुभागप्रमाण गुणसंक्रमद्रव्य है । तथा शेष एक भागप्रमाण उद्वेलनासंक्रम द्रव्य है। सम्यग्मिथ्यात्वके द्रव्यके असंख्यात खण्ड करके उनमेंसे बहुभागप्रमाण सर्वसंक्रम द्रव्य है। शथ एक भागके असंख्यात खण्ड करके उनमेंसे बहुभागप्रमाण गुणसंक्रम द्रव्य है । शेष एक भागके असंख्यात खण्ड करके उनमेंसे बहुभागप्रमाण अधःप्रवृत्तसंक्रम द्रव्य है। शेष एक भागके असंख्यात भाग करके उनमेंसे बहुभागप्रमाण विध्यातसंक्रमद्रव्य है । तथा शेष एक भागप्रमाण उद्वेलनासंक्रमद्रव्य है। इसीप्रकार बारह कषाय, स्त्रीवेद, नपुंसकवेद, और शोकके विषयमें जानना चाहिए । इतनी विशेषता है कि इन प्रकृतियोंका उद्वेलनासंक्रम नहीं होता। पुरुषबेद, क्रोधसंज्वलन, मानसंज्वलन और मायासंज्वलनके अपने अपने द्रव्यके असंख्यात खण्ड करके उनमेंसे बहुभागप्रमाण सर्वसंक्रमद्रव्य है। तथा शेष एक भागप्रमाण अधःप्रवृत्तसंक्रमद्रव्य है । हास्य, रति, भय और जुगुप्साके अपने अपने दयके असंख्यात खंड करके उनमेंसे बहभागप्रमाण सर्वसंक्रमद्रव्य है। शेष एक भागके असंख्यात खण्ड करके उनमेंसे बहुभागप्रमाण गुणसंक्रमद्रव्य है । तथा शेष एक भागप्रमाण अधःप्रवृत्तसंक्रमद्रव्य है। लोभसंज्वलनका भागाभागविधान नहीं है, क्योंकि इसमें एकमात्र अधःप्रवृत्तसंक्रम होता है। इसी प्रकार मनुष्यत्रिकमें जानना चाहिए । श्रादेश भागाभाग और जघन्य भागाभाग जानकर लेजाना चाहिए। इस प्रकार प्रदेशभागाभाग समाप्त हुआ। ६२४. सर्वसंक्रम और नोसर्वसंक्रमकी अपेक्षा निर्देश दो प्रकारका है-श्रोध और आदेश । ओघसे सब प्रकृतियोंके सर्वोत्कृष्ट प्रदेशाप्रका संक्रम करनेवाले जीवके सर्वसंक्रम होता है। तथा इससे न्यून प्रदेशाग्रका संक्रम करनेवाले जीवके नोसर्वसंक्रम होता है। इसीप्रकार अनाहारक मार्गण तक जानना चाहिए।
SR No.090221
Book TitleKasaypahudam Part 09
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size19 MB
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