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________________ [14] दृष्टि जीव मिथ्यात्वका उत्कृष्ट स्थितिबन्धकर श्रन्तर्मुहूर्तमें वेदकसम्यग्दृष्टि हो जाता है, उसके मिथ्यात्वकी अन्तर्मुहूर्त कम उत्कृष्ट स्थितिका ही सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वरूपसे संक्रम होता है । इस प्रकार इन दोनों प्रकृतियोंकी जब यत्स्थिति ही मिध्यात्वके उत्कृष्ट स्थितिबन्धसे अन्तर्मुहूर्त कम है तो इनका उत्कृष्ट स्थितिसंक्रम श्रद्धाच्छेद तो कम होगा ही यह उत्कृष्ट स्थितिसंक्रम श्रद्धाच्छेदका विचार है । जघन्य स्थिति संक्रम श्रद्धाच्छेद में इतना ही वक्तव्य है कि सम्यक्त्व और लोभ संज्वलनका स्वोदयसे क्षय होता है, इसलिए इनका जघन्य स्थितिसंक्रम श्रद्धाच्छेद एक स्थिति प्रमाण प्राप्त होता है, क्योंकि इन दोनों कर्मोंकी एक समय अधिक एक श्रावलिप्रमाण जघन्य स्थितिके शेष रहने पर उदयावलिसे उपरिम स्थितिका संक्रम बन जाता है । किन्तु शेष प्रकृतियोंका स्वोदयसे क्षय नहीं होता, इसलिए इनकी अन्तिम फालिका परोदयसे पतन होते समय जो श्रायाम होता है वही इनका जघन्य स्थिति संक्रम श्रद्धाच्छेद है | यह स्थितिसंक्रम श्रद्धाच्छेदका विचार है । स्वामित्वका विचार इसी श्राधारसे कर लेना चाहिए । विशेष स्पष्टीकरण मूल में किया ही है। तथा इसी प्रकार शेष अनुयोगद्वारोंका व्याख्यान भी मूलसे जान लेना चाहिए । अनुभाग संक्रम कमी पने कार्यको उत्पन्न करनेकी शक्तिका नाम श्रनुभाग है और उसका अन्य स्वभावरूप बदल जाना अनुभागसंक्रम है । इसके मूलप्रकृति श्रनुभागसंक्रम और उत्तरप्रकृतिश्रनुभागसंक्रम ऐसे दो भेद हैं । उनमेंसे मूल प्रकृतिका अपकर्षण और उत्कर्षणके द्वारा अनुभागका बदल जाना मूलप्रकृतिश्रनुभागसंक्रम है तथा उत्तरप्रकृतियोंके अनुभागका उत्कर्षण, अपकर्षण और अन्य प्रकृतिसंक्रमके द्वारा अन्य अनुभागरूप परिणम जाना उत्तरप्रकृतिअनुभागसंक्रम है । इस प्रकार उक्त व्याख्यानसे यह स्पष्ट हो जाता है कि यहाँ पर अनुभागसंक्रमसे उत्कर्षण, अपकर्षण और अन्य प्रकृतिसंक्रम इन तीनों प्रकारसे अनुभागका परिवर्तन इष्ट है । उसमें सर्वप्रथम अनुभागं श्रपकर्षणका स्पष्टीकरण करते है । 1 । अनुभागमपकर्षण - ऐसा नियम है कि जिस स्पर्धकका अपकर्षण होता है उससे नीचे नन्त स्पर्धक प्रतिस्थापनारूप होते हैं और उनसे नीचे श्रनन्त स्पर्धक निक्षेपरूप होते हैं । इसलिए प्रारम्भके जघन्य निक्षेप और जघन्य प्रतिस्थापनारूप स्पर्धकोंका अपकर्षण कभी नहीं होता यह सिद्ध होता है । यहाँ जघन्य निक्षेप और जघन्य प्रतिस्थापनासे उपरिम स्पर्धककी अपेक्षा यह कथन किया है । उस स्पर्धकसे लेकर उत्कृष्ट स्पर्धक तक अन्य सब स्पर्धकोंका अपकर्षण होना सम्भव है । इतना विशेष है कि व्याधातको छोड़कर सर्वत्र प्रतिस्थापना तो एक समान रहती है मात्र निक्षेपमें वृद्धि होती जाती है। जघन्य निक्षेप और जघन्य प्रतिस्थापनाका प्रमाण कितना है इसका उल्लेख करते हुए लिखा है कि एक प्रदेशगुणहानिस्थानान्तरका जितना प्रमाण है उससे जघन्य निक्षेपका प्रमाण अनन्तगुणा है और उससे भी जन्य प्रतिस्थापनाका प्रमाण अनन्तगुणा है । यहाँ अनुभागका प्रकरण है, इसलिए यहाँ पर अनुभागकी अपेक्षा ही प्रदेशगुणहानिस्थानान्तरका विचार करना चहिए। तदनुसार जहाँ प्रथम स्पर्धक की प्रथम वर्गणासे लेकर उत्तरोत्तर अवस्थित चयकी हानि द्वारा दूनी हानि हो जाती है उस अवधि तकके श्रध्वानकी प्रदेशगुणहानिस्थानान्तर संज्ञा है । इस प्रदेशगुणहानिस्थानान्तर में भव्यों से श्रनन्तगुणे अनन्त स्पर्धक होते हैं । इससे जघन्य निक्षेप और जघन्य प्रतिस्थापनाका प्रमाण अनुभागकी अपेक्षा कितना है यह स्पष्ट हो जाता है । यह तो जघन्य निक्षेप और जवन्य प्रतिस्थापनाका खुलासा है । उत्कृष्ट प्रतिस्थापना और उत्कृष्ट निक्षेपका विचार करते हुए वहाँ बतलाया हैं कि जवन्य प्रतिस्थापनासे उत्कृष्ट अनुभागकाण्डक अनन्तगुणा होता है और उससे एक वर्गणा कम उत्कृष्ट प्रतिस्थापना होती है। यह उत्कृष्ट प्रतिस्थापना
SR No.090221
Book TitleKasaypahudam Part 09
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size19 MB
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