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________________ १०२ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [बंधगो ६ ३५६. तं जहा-एयसमयं भुजगारबंधेण परिणमिय तदणंतरसमए तत्तियंचेव बंधिय तदियसमए पुणो वि बंधवुडीए परिणदो होदण बंधावलियवदिकमे ताए चेव परिवाडीए संकामओ जादो लद्धो पयदजहण्णकालो। * उक्कस्सेण तेवहिसागरोवमसदं सादिरेयं ६३६०. तं जहा-एगो मिच्छाइट्ठी उवसमसम्मत्तं घेतण परिणामपच्चएण मिच्छत्तं गदो। तत्थ मिच्छत्तस्स तप्पाओग्गमणुकस्साणुभार्ग बंधिय अंतोमुहुत्तकालं तिरिक्खमणुस्सेसु अवट्ठिदसंकामओ होदूण पुणो पलिदोवमासंखेजभागाउएसु भोगभूमिएसु उववण्णो तत्थावट्ठिदसंकमं कुणमाणो अंतोमुहुत्तावसेसे सगाउए वेदगसम्मत्तं पडिवन्जिय देवेसुववण्णो तत्तो पढमच्छावट्ठिमणुपालिय अंतोमुहुत्तावसेसे सम्मामिच्छत्तमवद्विदसंकमाविरोहेण मिच्छत्तं. वा पडिवण्णो । पुणो वि अंतोमुहुत्तेण वेदगसम्मतं पडिवजिय विदियच्छावट्ठिमवविदसंकममणुपालेण तदवसाणे पयदाविरोहेण मिच्छत्तं गंतूणेकतीससागरोवमिएसु उववण्णो तदो णिप्पिडिदो संतो मणुसेसुववण्णो जाव संकिलेसं ण पूरेदि ताव अवट्टिदसंकमेणेवावद्विदो। तदो संकिलेसवसेण भुजगारबंधं काऊण बंधावलियवदिक्कमे तस्स संकामओ जादो लद्धो पयदुक्कस्सकालो दोअंतोमुहुत्तेहि पलिदोवमासंखेजभागेण च अब्भहियतेवट्ठिसागरोवमसदमेत्तो। सम्मत्तस्स अप्पयरसंकाममो केवचिरं कालादो होदि ? ३५६. यथा-एक समय तक भुजगारबन्धरूप परिणमन करके दूसरे समयमें उतना ही बन्ध करके तीसरे समयमें फिर भी बन्धकी वृद्धिरूपसे परिणत होकर बन्धावलिके बाद उसी परिपाटीसे संक्रामक हो गया। इस प्रकार प्रकृत जघन्य काल प्राप्त हुआ। * उत्कृष्ट काल साधिक एकसौ वेसठ सागर है। ६३६०. यथा-एक मिथ्यादृष्टि जीव उपशमसम्यक्त्वको प्राप्त कर परिणामवश मिथ्यात्वको प्राप्त हुआ और वहाँ मिथ्यात्वके तत्प्रायोग्य अनुत्कृष्ट अनुभागका बन्धकर अन्तमुहूर्तकाल तक तिर्यश्चों और मनुष्योंमें अवस्थितपदका संक्रामक होकर फिर पल्यके असंख्यातवें भागप्रमाण आयुवाले भोगभूमिजोंमें उत्पन्न हुआ। तथा वहाँ अवस्थितपदका संक्रम करता हुआ अपनी आयुमें अन्तर्मुहूर्त काल शेष रहनेपर तथा वेदकसम्यकत्वको प्राप्त होकर देवोंमें उत्पन्न हुआ । अनन्तर प्रथम छयासठ सागर कालतक उसका पालन करके अन्तर्मुहूर्त काल शेष रहने पर सम्यग्मिथ्यात्वको या अवस्थित संक्रममें विरोध न आवे इस प्रकार मिथ्यात्वको प्राप्त हुआ। इसके बाद फिर भी अन्तर्मुहूर्तकालमें वेदकसम्यक्त्वको प्राप्त करके दूसरे छयाछठ सागर काल तक अवस्थितसंक्रमका पालनकर उसके अन्तमें प्रकृत स्वामित्वके अविरोधरूपसे मिथ्यात्यको प्राप्तकर इकतीस सागरकी आयुवाले जीवोंमें उत्पन्न हुआ । अनन्तर वहाँसे निकलकर मनुष्योंमें उत्पन्न हुआ तथा जब तक संक्लेशको नहीं प्राप्त हुआ तब तक अवस्थित संक्रमरूपसे अवस्थित रहा। अनन्तर संक्लेशवश भुजगारबन्ध करके बन्धावलिके व्यतीत होनेपर उसका संक्रामक हो गया। इस प्रकार दो अन्तर्मुहूर्त और पल्यका असंख्यातवा भाग अधिक एकसौ ग्रेसठ सागरप्रमाण प्रकृत उत्कृष्ट काल प्राप्त हुआ। * सम्यक्त्वके अल्पतरसंक्रामकका कितना काल है ?
SR No.090221
Book TitleKasaypahudam Part 09
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size19 MB
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