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________________ गा ५.८ ] उत्तरपयडिप्रणुभागसंकमे भुजगार संकमस्स सामित्त हह पुव्त्रसंजोगे अत्तव्त्रसंकमदंसणादो । तदो बारसक० - णवणोक० अवत्त ० संका० को होड़ ? सो सामणादो परिवदमाणओ देवो वा पढमसमयसंकामओ । अनंतागु० अवत्तव्यसंकामओ को होइ ! बिसंजोयणादो संजुत्तो होदू गावलियादिक्कतो त्ति सामित्तं कायव्यमिदि भावत्थो । एवमेदं परूविय संपहि सम्मत्त सम्मामिच्छत्तगयसामित्तभेदपदुप्पायणट्टमुत्तरसुत्तपबंधो * सम्मन्त-सम्मामिच्छत्ताणं भुजगार संकामओ एत्थि । ६ ३४७. कुदो ! तदणुभागस्स वडिविरहेणावद्विदत्तादो । * अप्पदर अवत्तव्वसंकामगो को होइ ? ३४८. सुगमं । * सम्माइट्ठी अण्णदरो । ६ ३४६. एत्थ सम्माइट्टिणिद्देसो मिच्छाइडिपडिसेहफलो, तत्थ पयदसामित्तसंभवविरोहादो । अण्णदरणिद्देसो ओगाहणादिविसेसणिरायरणफलो । तदो अणादियमिच्छाइट्ठी सादिछत्रीससंतकम्मिओ वा सम्मत्तमुप्पाइय विदियसमए अवत्तव्त्रसंकामओ होइ । अप्पदरसंकामओ दंसणमोहक्खाओ, अण्णत्थ तदणुवलंभादो । * अवद्विदसंकामओ को होइ ? विसंयोजनापूर्वक संयोग होने पर अवक्तव्यसंक्रम देखा जाता है। इसलिए बारह कषाय और नौ नोकषायका वक्तव्यसंक्रामक कौन होता है ? जो सर्वोपशामनासे गिरनेवाला अथवा मरकर देव होता है वह प्रथम समयमें संक्रमण करनेवाला जीव इनका अवक्तव्यसंक्रामक होता है। अनन्तानुबन्धीचतुष्कका अवक्तव्यसंक्रामक कौन होता है ? विसंयोजनाके बाद संयुक्त होकर जिसका एक आवलि काल गया है वह इनका वक्तव्यसंक्रामक होता है । इस प्रकार यहाँ पर स्वामित्व करना चाहिए यह इसका भावार्थ है। इस प्रकार इसका कथन करके अब सम्यक्त्व और सम्यग्मध्यात्वगत स्वामित्रकी भिन्नता दिखलानेके लिए श्रागेकी सूत्रपरिपाटी आई है * सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वका भुजगारसंक्रामक कोई नहीं होता । ९ ३४७. क्योंकि उनका अनुभाग वृद्धि से रहित होनेके कारण अवस्थित है । * अल्पतर और अवक्तव्यसंक्रामक कौन होता है ? ६३४८. यह सूत्र सुगम है । * अन्यतर सम्यग्दृष्टि होता है । ६ ३४६. यहाँ पर सम्यग्दृष्टिपदके निर्देशका फल मिथ्यादृष्टिका निषेध करना है, क्योंकि मिथ्यादृष्टिको प्रकृत विषयका स्वामी होने में विरोध आता है। अन्यतर पदके निर्देशका फल अव गाहना आदि विशेषका निराकरण करना है। इसलिए अनादि मिध्यादृष्टि या छब्बीस प्रकृतियोंकी सत्तावाला सादि मिध्यादृष्टि जीव सम्यक्त्वको उत्पन्न करके दूसरे समयमें अवक्तव्य संक्रमका स्वामी होता है। तथा श्रल्पतरसंक्रामक दर्शनमोहनीयका रूपक होता है, क्योंकि अन्यत्र अल्पतरपद नहीं पाया जाता । * अवस्थितपदका संक्रामक कौन होता है ?
SR No.090221
Book TitleKasaypahudam Part 09
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size19 MB
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