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________________ ६६ जयपुर (खानिया) तस्वचर्चा और उसको समीक्षा योग्यताको ध्यान में रखकर ही इनमें आचार्योंने इतरेतराभावका निर्देश किया है। फिर क्या कारण है कि मिट्टी से जुलाहा पट पर्यायका निर्माण करने में सर्वथा असमर्थ रहता है। यदि अपर पक्ष कहे कि वर्तमानमें मिट्टी में टप बनेकी पर्याय योग्यता न होनेसे ही जुलाहा मिट्टी से पट बनाने में असमर्थ है तो इससे सिद्ध हुआ कि जो द्रव्य जब जिस पर्यायके परिधामन के सम्मुख होता है तभी अन्य सामग्री उसमें व्यवहारसे निमित्त होती है और इस दृष्टिसे विचार कर देखने पर वही निर्णय होता है कि बाह्य सामग्री मात्र अन्य कार्य करने में वैसे हो उदासीन है जैसे धर्मद्रव्य गति उदासीन है। सब द्रव्य प्रत्येक समय में अपना-अपना कार्य करने में हो व्यस्त रहते है। उन्हें तीनों कालोंमें एक क्षणका भी विश्राम नहीं मिलता कि वे अपना कार्य छोड़कर दूसरे का कार्य करने लगें । अतएव इष्टोपदेशके उक्त बचनके अनुसार प्रकृत में यही समझना चाहिए कि जिस प्रकार धर्म द्रव्य अन्यका कार्य करनेमें उदासीन है उसी प्रकार अन्य सभी द्रव्य अन्य द्रव्यका कार्य करनेमें उदासीन हैं। यह तो काल प्रत्यासत्तिका ही साम्राज्य समझिए कि कभी और कहीं वे अन्य के कार्य प्रेरक निमित्त व्यवहार पदवीको प्राप्त हो जाते हैं और कभी तथा कहीं वे अन्य कार्यमें उदासीन निमित्त व्यवहार पदवीको प्राप्त हो जाते हैं । बौद्ध दर्शन, कारणको देखकर भी कार्यका अनुमान किया जा सकता है, इसे स्वीकार नहीं करता । इसी बात को ध्यान में रखकर कैसा कारणरूप लिंग कार्यका अनुमापक होता है यह सिद्ध करनेके लिये यह लिखा है कि जहाँ कारणसामग्रीकी अविकलता हो और उससे भिन्न कार्यको ज्ञापक सामग्री उपस्थित न हो वहाँ कारण से कार्यका अनुमान करने में कोई बाधा नहीं आती। किन्तु हमें खेद है कि अपर पक्ष इस कथनका ऐसा विपर्यास करता है जिसका प्रकृतमें कोई प्रयोजन ही नहीं । इराका विशेष विचार हम छठी शक के तीसरे दौर के उत्तरमें करनेवाले हैं, इसलिए इस आधारसे यहाँ इसकी विशेष चर्चा करना हम इष्ट नहीं मानते । किन्तु यहाँ इतना संकेत कर देना आवश्यक समझते हैं कि जिस प्रकार विवक्षित कार्यकी विवक्षित बाह्य सामग्री ही नियत हेतु होती है उसी प्रकार उसकी विवक्षित उपादान सामग्री ही नियत हेतु हो सकेगी। अतएव प्रत्येक कार्य प्रत्येक समय में प्रतिनियत आभ्यन्तरबाह्य सामग्रीको निमित्त कर ही उत्पन्न होता है ऐसा समझना चाहिए। स्व-परप्रत्यय परिणमनका अभिप्राय भी यही है । इस परसे उपादानको अनेक योग्यतावाला कह कर बाह्य सामग्री के बलपर चाहे जिस कार्यकी उत्पत्तिकी करूपना करना मिथ्या है। अपर पक्ष का कहना है कि बाह्य सामग्री उपादानके कार्य में सहयोग करती है सो यह सहयोग क्या वस्तु है ? क्या दोनों मिलकर एक कार्य करते हैं यह सहयोगका अर्थ है ? किन्तु यह तो माना नहीं जा सकता, क्योंकि दो द्रव्य मिलकर एक क्रिया नहीं कर सकते ऐसा द्रव्यस्वभाव है (देखो समयसार कलश ५४ ) । क्या एक द्रव्य दूसरे द्रव्यकी क्रिया कर देता है यह सहयोगका अर्थ हूँ ? किन्तु यह कथन भी नहीं माना जा सकता, क्योंकि एक द्रव्य अपनेसे भिन्न दूसरे द्रव्यकी क्रिया करनेमें सर्वथा असमर्थ है (देखो प्रव घनसार अ० २ गा० ९५ जयसेनीय टीका ) | क्या एक द्रव्य दूसरे द्रव्यको पर्याय में विशेषता उत्पन्न कर देता है यह सहयोगका अर्थ है ? किन्तु जब कि एक द्रव्यका गुणधर्म दूसरे द्रव्यमें संक्रमित ही नहीं हो सकता ऐसी अवस्था में एक दव्य दूसरे द्रव्यको पर्याय में विशेषता उत्पन्न कर देता है यह कहना किसी भी अवस्था परमार्थभूत नहीं माना जा सकता (देखो समयसार गाथा १०३ और उसकी आत्मख्याति टीका) । उपादान अनेक योग्यतावाला होता है, इसलिए बाह्य सामग्री उसे एक योग्यता द्वारा एक कार्य करनेमें ही
SR No.090217
Book TitleJaipur Khaniya Tattvacharcha Aur Uski Samksha Part 1
Original Sutra AuthorVanshidhar Vyakaranacharya
AuthorDarbarilal Kothiya
PublisherLakshmibai Parmarthik Fund Bina MP
Publication Year
Total Pages504
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Questions and Answers
File Size14 MB
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