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________________ जयपुर (खानिया) तत्त्वचर्चा और उसकी समीक्षा अपने पक्षके समर्थनमें अपर पक्षने में आठ प्रमाण उपस्थित किये है। इन सब द्वारा किस कार्यमें कौन किस रूपमें निमित्त है इसका व्यवहारनयसे निर्देश किया गया है। इसको स्पष्ट रूपसे समझने के लिये समयसारका वह वचन पर्याप्त है जह राया ववहारा दोसगणुप्पादगो ति आलविदो। तह जीवो बवहारा दबगुणुप्पादगो भणिदो ।।१०८।। जिस प्रकार राजा व्यवहारसे प्रजाके दोष-मुणका उत्पादक कहा गया है उसी प्रकार जीव व्यवहारसे पुद्गल द्रव्यके गुणोंका उत्पादक कहा गया है ।।१०८॥ आशय यह है कि यथार्थमें प्रत्येक द्रव्य अपना कार्य स्वयं करता है और अन्य बाह्य सामग्री उसमें निमित्त होती है । फिर भी लोकमें निमित्त व्यवहारके योग्य बाह्य सामग्रीको अपेक्षा यह कहा जाता है कि'इसने यह कार्य किया ।' पूर्वमें अपर पक्षने जो आठ आगम प्रमाण उपस्थित किये है वे सब व्यवहारनयके वचन है, अतः उन द्वारा यही सूचित किया गया है कि किस कार्यमें कौन निमित्त है। प्रत्येक कार्यमें उपादान और निमिस व्यवहारके योग्य बाह्य सामग्रीकी युति निवमसे होती है इसमें मन्देह नहीं । परन्तु उपादान जैसे अपने कार्य में स्वयं व्यापारदान होता है वैसे आह्य सामग्री उसके कार्य में व्यापारबान नहीं होती यह सिद्धान्त है । इसे हुदयंगम करके यथार्थका निर्णय करना चाहिए । इसी तथ्यको स्पष्ट करते हुए पुरुषार्थसिद्धथुपायमें कहा है जीवकृतं परिणाम निमित्तमात्रं प्रपद्य पुनरम्ये । स्वयमेव परिणमन्तेऽत्र पुद्गलाः कर्मभावेन ।।१२।। जीवके द्वारा किये गये परिणामको निमित्तमान करके उससे भिन्न पुग़ल स्वयं ही कर्भरूपसे परिणम जाते हैं ।।१२।। यहाँ 'जीवकृत' और 'स्वयमेव' ये दोनों पद ध्यान देने योग्य है । जीवके राग-द्वेष आदि परिणामोंकी उत्पत्ति में यद्यपि कर्मोदय निमित्त है फिर भी उन्हें जीवकृत कहा जाता है। इससे स्पष्ट विदित होता है कि जिस द्रव्यमें जो कार्य होता है उसका मुख्य (निश्चय-यथार्थ) का वही द्रव्य होता है, निमित्त व्यवहारके योग्य बाह्य सामग्री नहीं । जरो का ऋह्ना उपचार कथन है। जिस द्रनामें जो कार्य होता है उसका मुख्य का वह द्रव्य तो है ही, साथ ही वह परनिरपेक्ष होकर ही उसे करता है यह 'स्वयमेव' पक्ष्से सूचित होता है । प्रस्तुत प्रतिशंकामें अपर पक्षने कर्मोदनको जीवको आन्तरिक योग्यताका सूचक स्वीकार कर लिया है, अतः इससे भी उक्त कथनकी ही पुष्टि होती है । स्पष्ट है कि उक्त आठों मागम प्रमाण अपर पक्षके विचारों के समर्थक न होकर समयसारके उक्स कथनका ही समर्थन करते हैं । अतएव उनसे हमारे विचारोंकी ही पुष्टि होती है। ___अपर पक्षने इन प्रमाणोंमें एक प्रमाण 'कत्थ वि बलिओ जीवो' यह वचन भी उपस्थित किया है और इसको उत्थानिकामें लिखा है कि-'जब जीव बलवान् होता है तो वह अपना कल्याण कर सकता है।' यहाँ विचार यह करना है कि ऐसी अवस्थामै जीव स्वयं अपना कल्याण करता है या बाह्य सामग्री द्वारा उसका कल्याण होता है। यदि बाध सामग्री द्वारा उसका कल्याण होता है यह माना जाम तो 'जीव अपना कल्याण कर सकता है ऐसा लिखना निरर्थक है और यदि वह स्वयं अपना कल्माण कर लेता है यह
SR No.090217
Book TitleJaipur Khaniya Tattvacharcha Aur Uski Samksha Part 1
Original Sutra AuthorVanshidhar Vyakaranacharya
AuthorDarbarilal Kothiya
PublisherLakshmibai Parmarthik Fund Bina MP
Publication Year
Total Pages504
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Questions and Answers
File Size14 MB
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