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________________ जयपुर ( खानिया ) तत्त्वचर्चा और उसकी समीक्षा मंगलं भगवान् वीरो मंगलं गौतमो मणी। मंगलं कुन्दकुन्दार्यों जैनधर्मोऽस्तु मंगलम् ॥ शंका १ द्रव्यकर्मके उदयसे संसारी आत्माका विकारभाव और चतुर्गतिभ्रमण होता है या नहीं? प्रतिशंका ३ रा समाधान इस प्रश्नका मगाधान करते हुए प्रथम उत्तरमें ही हम यह बतला आये है कि संसारी आत्माके विकारभाव और चतुर्गतिपरिभ्रमणमें द्रव्यकर्मका लक्ष्य निमित्तमात्र है । विकारभाव तथा चतुर्गति परिभ्रमणका मुख्यकर्ता तो स्वयं आत्मा ही है । इस तथ्य को पुष्टिमें हमने रामयसार, पंचास्तिकायटोका, प्रवचनसार.. और उसको टीकाके अनेक प्रमाण दिये है किन्तु अपर पक्ष इस उत्तरको अपने प्रश्नका समाधान माननेके लिए तगार प्रतीत नहीं होता। एक ओर तो बह द्रध्यकम के उदयको निमित्तरूपसे स्वीकार करता है और दूसरी और द्रब्वकर्मोदय और संसारी आत्माके विकारभाव तथा चतुर्गतिपरिभ्रमणमें व्यवहार नयसे बतलाये गये निमित्त नैमित्तिकसम्बन्धको अपने मूल प्रश्नका उत्तर नहीं मानता इसका हमें आश्चर्य है । हमारे प्रथम उत्तरको लक्ष्य कर अपर पक्षकी ओरसे उपस्थित की गई प्रतिशंका २ के उत्तरमें भी हमारी ओरसे अपने प्रथम उत्तरमे निहित अभिप्रायकी ही पुष्टि की गई है। __ तत्काल हमारे सामने हमारे द्वितीय उत्तरके आधारसे लिखी गई प्रतिशंका ३ विचारके लिए उपस्थित है । इस द्वारा सर्वप्रथम यह शिकायत की गई है कि हमारी ओरसे अपर पक्षने मूल प्रश्नका उत्तर न तो प्रथम वक्तव्यमें ही दिया गया है और न ही दूसरे वक्तव्यमें दिया गया है । 'संसारी जीवके विकारभाव और चतुगति परिभ्रमणमें कर्मोदय व्यवहारनपसे निमित्तमात्र है, मुख्य कर्ता नहीं' इस उत्तरको अपर पक्ष अप्रासंगिक मानता है। अब देखना यह है कि वस्तूस्वरूपको स्पष्ट करनेकी दृष्टिसे जो उसर हमारी औरसे दिया गया है वह अप्रासंगिक है या अपर पक्षका वह कथन अप्रासंगिक ही नहीं सिद्धान्तविरुद्ध है जिसमें उसकी ओरसे विकारका कारण बाह्य सामग्री है इसे यथार्थ कथन माना गया है। अपर पक्षने पद्मनन्दि पंचविंशतिका २३, ५ का 'हृयकृतो लोके विकारो भवेत्' इस वचनको उद्धृत कर जो विकारखो दोका कार्य बतलाया है सो यहाँ देखना यह है कि जो विकाररूप कार्य होता है वह किसी एक द्रव्यकी विभाव परिणति है या दो द्रव्योंकी मिलकर एक विभाव परिणति है ? यह दो द्रव्योंकी मिलकर एक विभाव परिणति है यह तो कहा नहीं जा सकता, क्योंकि दो द्रश्य मिलकर एक कार्यको त्रिकालमें नहीं कर सकते । इसी बातको समयसार आत्मख्याति टीकामें स्पष्ट करते हुए बतलाया है नोभी परिणमतः खलु परिणामो नोभयोः प्रजायेत । उभयोन परिणतिः स्याद्यदनेकमनेकमेव सदा ॥५३॥ इसकी टीका करते हुए पं० श्री जयचन्द जी लिखते हैं दो द्रव्य एक होके नहीं परिणमते और दो व्यका एक परिणाम भी नहीं होता तथा दो द्रव्यकी एक परिणति क्रिया भी नहीं होती, क्योंकि जो अनेक द्रव्य हैं वे अनेक ही हैं एक नहीं होते ॥ ५३॥
SR No.090217
Book TitleJaipur Khaniya Tattvacharcha Aur Uski Samksha Part 1
Original Sutra AuthorVanshidhar Vyakaranacharya
AuthorDarbarilal Kothiya
PublisherLakshmibai Parmarthik Fund Bina MP
Publication Year
Total Pages504
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Questions and Answers
File Size14 MB
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