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________________ अपनी बात त्रिकालमें नहीं कर सकतं ।' यह कथन अपरपक्ष के अभिप्रायके प्रतिकूल होनेसे अनावश्यक है । इसका स्पष्टी. करण मैंने इसी समीक्षाग्रन्थगे १० ३३ पर विस्तारसे किया है । इसी तरह सोनगढ़पक्षने तत्वचर्चाक पृ० ३२ पर भी लिखा है कि "इस प्रश्नका समाधान करते हुए प्रथम उत्तर में ही हम यह बतला आये हैं कि संसारी आत्माके विकारभाव और चतुर्गतिपरिभ्रमण) द्रव्यक्रमका उदय निमित्त मात्र है । विकारभाव तथा चतुर्गतिपरिभ्रमणका मुख्यकर्ता तो स्वयं श्रात्मा ही है ।" सो सोनगढ़पक्षका यह लिखना भी शक्तिका दुरुपयोग है, क्योंकि अगरपझने कहीं पर भी यह नहीं लिखा है कि अकर्मका उदय संसारी आत्माके विकारभाय और चतुर्गतिभ्रमणका मुख्य कर्ता है। यह प्रश्नोत्तर एबके सामान्यसमीक्षा-प्रकरणमें किये गये सोनगढ़पक्ष और अपरपक्षके मतैक्य और मतभेदके स्पष्टीकरणसे समझा जा सकता है। ४, सोनगढ़पक्षने सर्वत्र अधिकतर निरर्षक वितण्डावादका आश्रय लिया है। यह भी प्रत्येक प्रश्नोत्तरको समीक्षासे समझा जा सकता है । ५. सोनगरपक्षने तत्वचर्चामें अनेक स्थलोंपर |नःसंकोच छलवत्तिको भी अपनाया है। उदाहरणार्थ-उसने त चप०७४-७५ पर लिखा है कि यहाँ अपरपक्षने 'स्वयं' परके 'अपने आप' अर्थका विरोव दिसलान लिये गो प्रमाण दिये हैं उनके विषय में तो हमें विशेष कुछ कहना नहीं है । किन्तु यहाँ हम इतना संकेत कर देना आवश्यक समझते हैं कि एक तो प्रस्तुत प्रश्नके प्रथम व दूसरे उत्तरमें हमन 'स्वयमेंद' पदका अर्थ 'अपने आप न करके स्वयं ही' किया है। इस पदका 'अपने आप यह अर्थ अपरपक्षने हमारे कथनके रूप में प्रस्तुत प्रश्नकी दूसरी प्रतिकामें मानकर टीका करती प्रारंभ कर दी है जो युक्त नहीं है। हमने इसका विरोध इरालिये नहीं किया कि निश्चयकत्ताक अर्थभं 'स्वयमय पदका यह अर्थ ग्रहण करने में भी कोई आपत्ति नहीं । सो अवस्थामें 'अपने आप' पदका अर्थ होगा 'परकी सहायता बिना आप कर्ता होकर' । आशय इतना ही है कि जिसकी क्रिया अपने में हो कार्य अपने में हो वह दूसरेकी सहायता लिये बिना अपने कार्यका आप ही कर्ता होता है अन्य पदार्थ नहीं ।" यहाँ सोनगढ़पक्ष द्वारा अपनाई गई छलवत्तिका मैंने इस समीक्षाके १० १८६-१८७ पर विस्तारसे प्रकाशन किया है। ६. सोनगढ़पक्षने तत्त्वचर्चा में आगमप्रमाणोंका निर्भवताके साथ अनर्थ किया है, यह बात भी तत्त्वचर्चाकी समीक्षा स्वाध्यायसे अवगत हो जायगी। ये सब तथ्य ऐसे हैं जिनसे सोनगढ़पक्षके स्वमत-समर्थन में किये गये प्रयत्न स्पष्टतया असम्यक् सिद्ध होते हैं । ग्रन्थ-मुद्रणमें कुछ भूलें १. सानिया तत्त्वचर्चा पृ० १५ पंक्ति ४ में "आगे-पीछे करनेका" इस वाक्यांशके स्थानपर 'आगेपीछे न करनेका" यह मुद्रित हो गया है । इसका मुद्रण पाद-टिप्पणीके रूपमें होना या । यह हमारी अनवधानताके कारण हुआ है। २. सानिया तत्त्वचर्षा प० १९ पंक्ति ८ में भी “जो परिणमन होता है" इरा वाक्यांशके स्थान पर “जो परिणमित होता है" यह मुद्रित हो गया है । यह भी हमारी अनवधानताकै कारण हुआ है । इसका भी मुद्रण पाद-टिप्पणीके रूपमें होना था। ३. खानिया तत्त्वचर्चा पृ० १९ पर हीपाद-टिप्पणीके रूप में 'पूर्व पक्षके पत्रकमें लाल स्याहीसे चिह्नित वाक्यांश निम्न प्रकार है-यह वाक्य मुद्रित हो गया है जो मुद्रित नहीं होना था। वह भी हमारी अनवघानताके कारण हा है।
SR No.090217
Book TitleJaipur Khaniya Tattvacharcha Aur Uski Samksha Part 1
Original Sutra AuthorVanshidhar Vyakaranacharya
AuthorDarbarilal Kothiya
PublisherLakshmibai Parmarthik Fund Bina MP
Publication Year
Total Pages504
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Questions and Answers
File Size14 MB
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