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________________ अपनी बात एक बात और है । यह यह कि उपर्युक्त वक्तव्योंमें पं० फूलचन्द्रजीने जो यह लिखा है कि "इस प्रकार तीसरे दौरको प्रतिशंकासामग्री के प्राप्त होनेपर हमारे सामने अवश्य ही यह सवाल रहा है कि हम इसे स्वीकार कर उसके आधारपर प्रत्युत्तर तैयार करें या नियमविरुद्ध इस लिखित सामग्री के प्राप्त होनेसे हम उसे वापिस कर दें।" मेरा मत है कि पं० फूलचन्द्र जी या समस्त सोनगढ़ पक्ष प्रतिशंका तीनकी उस सामग्रीको नियमविरुद्ध कहकर. कदापि वापिस नहीं करते, क्योंकि उसे वापिस करने के प्रतिकूल परिणामको वे अच्छी तरह समझते थे। अतएवं सामग्रीको जो उन्होंने वापिस नहीं किया वह अपरिपक्षके प्रति उनकी उदारता या दया नहीं थी, अपितु वह उनकी प्रतिष्ठाका प्रश्न थ।। उपर्युक्त लिखनेमें उनका उद्देश्य केवल अपरपक्षको अप्रामाणिक और अयोग्य प्रचारित करना था | मैं पं० फूलचन्द्रजी और समस्त सोनगढ पक्षकी इस मनोवृत्तिको समझता था, अतः मैंने प्रतिशंका तीनकी सामग्रीके साथ पं० फूलचन्द्रजी और मध्यस्थजी दोनोंको जो विवरण पत्रकी प्रति भेजी थी उसमें सभी आवश्यक बातें सष्ट कर दी गई थीं। इसके अतिरिक्त उस सामग्रीपर मध्यस्थके हस्ताक्षर न होना कोई महत्वपूर्ण श्रुटि नहीं थी, जिसके कारण वह सामग्री सोनगढ़पक्षके लिए विचारके अयोग्य हो जाती । पं० फूलचन्द्र जी और समस्त सोनगढ़ पक्ष इस तथ्यको जानते भी थे । यही कारण है कि उस सामग्रीको वापिस न कर उसपर सोनगढ़ पक्ष द्वारा विचार किया गया। पं० फूलचन्द्रजीने जयपुर-लानिया तत्त्वचर्चाके सम्पादकीय पृष्ठ ३३ पर उसी जैसे अन्य नियमों के चल्लंघनके विषयमें लिखा है कि 'सम्मेलनकी कार्यवाही तारीख २१-१०-६३ से १-११-६३ तक चली थी। इन दिनोंमें तत्वचर्चा के दो दौर सम्पन्न हो चुके थे। तीसरा दौर होना शेष र । किन्तु सभी विद्वान् अपनेअपने घर जाने के लिये उत्सुक थे। इसलिये तीसरे दौरको सम्पन्न करनेके लिये अलगसे नियम बनाये गये । किन्तु उन नियमोंमेंसे पृष्ठसंख्या और समयकी मर्यादा निश्चित करने वाले नियमोंका दोनों ओरसे समुचित पालन न हो सका । परन्तु इससे तीसरे दौरको सम्पन्न करने में कोई दावा नहीं आयीं ।' इससे सहज ही इस निष्कर्षपर पहुँचा जा सकता है कि यतः पृष्ठसंख्या और समयकी मर्यादा निश्चित करनेवाले नियमोंका उल्लंघन सोनगढ़ पक्षने भी किया था, फिर भी उसे तो उन्होंने युक्त बतला दिया, लेकिन मध्यस्थ के हस्ताक्षर सम्बन्धी नियमका उल्लंघन बतः केबल अपरपक्षने किया था, अत: उसको ही उन्होंने अयुक्त बतलाया । पं० फूलचन्द्रजी और समस्त सोनगढ़ का यह कार्य न्याय और विवेकके अनुसरणका नहीं माना जा सकता है। मैं तो इरो उनका चातुर्य ही कहूंगा कि उन्होंने अपने अनुकूल और अपरपस के प्रतिकूल प्रचार करने हेतु संगत-असंगत और सच-झूठ सभी उपायोंका सुन्दर ढंगसे उपयोग किया है ! अस्तु । प्रस्तुत समीक्षा-ग्रन्थ १. प्रस्तुत ग्रन्थ जयपुर ( खानिया ) तत्वचर्चाकी संगोक्षाका प्रथम खण्ठ है । इसमें उक्त चर्चाक सभी-१७ प्रश्नोत्तरोंमसे वेबल आदिके चार प्रश्नोत्तरोंकी समीक्षा की गई है। शेष १३ प्रश्नोत्तरोंकी समीक्षा आगामी खण्डोंमें की जायेगी। २. इस खण्डमें उपत चारों प्रश्नोत्तरोंकी समीक्षाके चार-चार प्रकरण निर्धारित किये गये है(१) सामान्य समीक्षा, (२) प्रथम दौरकी समीक्षा, (३) द्वितीय दौरकी समीक्षा और (४) तृतीय दौरकी समीक्षा।
SR No.090217
Book TitleJaipur Khaniya Tattvacharcha Aur Uski Samksha Part 1
Original Sutra AuthorVanshidhar Vyakaranacharya
AuthorDarbarilal Kothiya
PublisherLakshmibai Parmarthik Fund Bina MP
Publication Year
Total Pages504
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Questions and Answers
File Size14 MB
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