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________________ १८1 पुण्डरीक नारायग, निशुम्भ प्रतिनारायण दिया गया, जिससे वह अधमरा हो गया। उसने भी क्रोध में निदान किया कि मैं इससे बदला लुगा । वह मरकर पल्प पुण्य के कारण ज्योतिषक देव बना । उसे अवधिज्ञान से अपने पूर्व भव के वैर का स्मरण हो पाया। वह बदला लेने की इच्छा से व्यापारी का देष धारण कर पाया और बड़े स्वादिष्ट फल सम्राट् की भेंट किये। इस प्रकार वह प्रतिदिन प्राता मोर राजा को वे ही फल भेंट करता। राजा को द फल बड़े स्वादिष्ट लगते थे । एक दिन वह फल नहीं लाया। राजा ने इसका कारण पूछा तो उस देव ने उत्तर दिया-'महाराज ! वे फल तो समाप्त हो गये। अब वे मिल भी नहीं सकते । जिस वन से मैं वे फल लाया था, उनकी रक्षा एक वनदेवी करती है। उसे प्रसन्न करके ही वे फल प्राप्त हो सकते हैं। यदि आपको वे फल प्रिय हैं तो आप मेरे साथ उस वन में चलिये और इच्छानुसार फल खाइये। चक्रवर्ती ने उसके साथ चलना स्वीकार कर लिया। मंत्रियों ने चक्रवर्ती को रोकना भी चाहा, किन्तु वह नहीं माना और उस छद्मवेषी देव के साथ जहाज द्वारा चल दिया। वास्तव में चक्रवर्ती का पुण्य समाप्त हो गया या । महलों से निकलते ही चक्रवर्ती के चक्र आदि रत्न भी चले गये। वह देव चक्रवर्ती के जहाज को गहरे समुद्र में ले गया। वहां उस देव ने पूर्व भव के रसोइमा का रूप बनाकर चक्रवर्ती को अपने प्रतिशोध की योजना बताई मौर फिर चक्रवर्ती को भयंकर पीड़ा देकर मार डाला। चक्रवर्ती भयंकर रौद्र ध्यान के कारण नरक में गया । सभौम चक्रवर्ती पाठयां चक्रवर्ती था। पुण्डरीक नारायण, निशुम्भ प्रतिनारायण प्रर्व भव-भगवान भरनाथ के तीर्थ में नन्दिरेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण मोर निशम्भ प्रतिनारायण हए । ये छठे नारायण, प्रतिनारायण थे। पूण्डरीक का जीव पहले तीसरे भव में राजकुमार था। सुकेतु नामक राजा से अपमानित होकर उसने अपने अपमान का बदला लेने का निदान बन्ध किया। अपने अपमान से दुखी होकर उसने दीक्षा ले ली। वह धोर तप करने लगा, किन्तु वह तपस्या करके भी मन से अपमान की शल्य दूर नहीं कर सका। वह मरकर पहले स्वर्ग में देव हुना। भरत क्षेत्र में चत्रपुर नामक नगर था। उस नगर का स्वामी इक्ष्वाकुवंशी राजा वरमेन या । उसकी रानी का नाम लक्ष्मीमती था। उस देव का जीव पायु के अन्त में लक्ष्मीमती रानी के गर्भ में पाया सौर उत्पन्न होने पर उसका नाम पुण्डरीक रवखा गया। इसी राजा की वैजयन्ती रानी से नन्दिषेण नामक पुत्र हमा। इन दोनों को प्राय छप्पन हजार वर्ष की थी, शरीर छब्बीस धनुष ऊँचा था। दोनों भाइयों में स्वभावत: बड़ा प्रेम था। सकेतु का जीव अनेक योनियों में भ्रमण करता हुआ निशुम्भ नाम का राजा बना । वह महा अभिमानी मौर बडी कर प्रकृति का था। सम्पूर्ण राजाओं को उसने वश में कर लिया था और राजा लोग उसके नाम से ही कांपते थे। उन दिनों राजकुमार पुण्डरीक पौर नन्दिषेण का प्रभाव निरन्तर बढ़ रहा था। इससे निशम्भ पुण्डरीक का अकारण शत्र बन गया और उसे दण्ड देने के लिये उचित अवसर की प्रतीक्षा में था। तभी एक घटना घटित हो गई। इन्द्रपुर के राजा उपेन्द्रसेन ने अपनी पुत्री पद्मावती का विवाह पुण्डरोक के साथ कर दिया । निशुम्भ तो कोई बहाना चाहता था। उसने एक चतुर दूत पुण्डरीक के पास भेजा और उससे पदमावती को देने का मादेश दिया। दोनों भाइयों ने दूत का अपमान करके निकाल दिया। निशुम्भ,ने जब यह सुना तो वह मारे क्रोध के प्राग बबूला हो गया और विशाल सेना सजाकर पुण्डरीक के साथ युद्ध करने चल दिया । दोनों भाई भी सेना लेकर रणभूमि में मा डटे। दोनों सेनाओं में घनघोर युद्ध हमा। निशम्भ की सेनायें दोनों भाइयों की मार के मागे नहीं ठहर सकी। तब निशम्भ स्वयं पूण्डरीक के साथ युद्ध करने मागे पाया। दोनों वीरों में लोमहर्षक गद्ध होने लगा। तब क्रोध में
SR No.090192
Book TitleJain Dharma ka Prachin Itihas Part 1
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBalbhadra Jain
PublisherGajendra Publication Delhi
Publication Year
Total Pages412
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, History, & Story
File Size15 MB
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