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________________ मरत और भारत १०६ २२. भरत का निर्वाण एक दिन चक्रवर्ती भरत अपने कक्ष में खड़े हुए दर्पण में मुख देख रहे थे। तभी उन्हें अपने केशों में एक सफेद बाल दीखा। उसे देखते ही उनके मन में शरीर और भोगों को प्रसारता को देखकर निर्वेद भर गया। उन्होंने तत्काल अपने ज्येष्ठ पुत्र अर्ककीर्ति का राज्याभिषेक किया और वन में जाकर सकल संयम धारण कर लिया। उन्हें उसी समय मनःपर्ययज्ञान उत्पन्न हो गया और उसके बाद ही केवलज्ञान प्रगट हो गया । पहले चना : राम द्वारा किया। अब भगवान भरत इन्द्रों और देवों द्वारा पूजित हो गये। भगवान भरत ने चिरकाल तक बिहार किया और अपने उपदेशों से असंख्य प्राणियों का कल्याण किया।मायु का पन्त निकट जानकर ये कैलाश पर्वत पर पहुंचे और वहाँ योग निरोष करके जन्म-जरा-मरण से सदा के लिए मुक्त हो गये। वे सिद्ध परमात्मा हो गये। भगवान के वृषभसैन प्रादि गणधर, भगवान के पुत्र तथा अन्य अनेक मुनि भी कर्मों का उच्छेद करके मुक्त हो गये। २३. भरत और भारत हमारा देश भारतवर्ष कहलाता है। इससे पहले इस देश का नाम महाराज नाभिराज के नाम पर अज नाभवर्ष कहलाता था। कहीं कहीं इसके स्थान पर अजनाभ खण्ड भी आता है। जब ऋषभवेव भारत का प्राचीन के ज्येष्ठ पुत्र भरत ने इस देश के छह खण्डों को जीतकर चक्रवर्ती पद धारण किया, तब नाम उन्होंने अपने नाम पर इसका नाम भारतवर्ष कर दिया। जैन साहित्य और भारत-जैन साहित्य में इस सम्बन्ध में असंदिग्ध शब्दों में उल्लेख मिलते हैं। भगवज्जिनसेनाचार्य ने 'आदिपुराण' पर्व १५ श्लोक १५६ में बताया है। तन्नाम्ना भारतं वर्षमितिहासोज्जनास्पदम । हिमारासमुद्रास्थ क्षेत्रं चक्रभुतामिदम् ॥ प्रर्थात् इतिहास के जानने वालों का कहना है कि जहाँ अनेक आर्य पुरुष रहते हैं ऐसा यह हिमवान् पर्वत से लेकर समुद्र पर्यन्त का चक्रवतियों का क्षेत्र भरत के नाम के कारण भारतवर्ष रूप से प्रसिद्ध हुमा । (यही श्लोक पुरुदेव चम्पू ६।३२ में भी इसी प्रकार मिलता है)। ' इसी प्रकार एक स्थान पर उक्त प्राचार्य कहते हैं पन्नाम्ना भरतावनित्वमगमत् षट्खण्ड भूषा मही ॥३॥२०॥ प्रर्थात् जिसके नाम से षट्खण्डों से विभूषित पृथ्वी भरत भूमि नाम को प्राप्त हुई। पौर भी ततोऽभिषिच्य साम्राज्ये भरतं सूनुमनिमम्। भगवान भारतं वर्ष लत्सनाथं व्यपाविषम् ।।१७१७६।। - पर्थात् भगवान ऋषभनाथ ने अपने ज्येष्ठ पुत्र भरत का राज्याभिषेक करके यह घोषणा की कि भरत से शासित देश भारतवर्ष कहलाये। इसी तथ्य को पयपुराण के कर्ता प्राचार्य रविषण ने कई स्थलों पर स्वीकार किया है। यचा
SR No.090192
Book TitleJain Dharma ka Prachin Itihas Part 1
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBalbhadra Jain
PublisherGajendra Publication Delhi
Publication Year
Total Pages412
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, History, & Story
File Size15 MB
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