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________________ ******** Alligश ******** आत्मभावना का फल ******************* कायप्रमाणमात्मानं, व्योमरूपं निरञ्जनम्। चैतन्यं भावयेन्नित्यं, ज्ञानं प्राप्नोति निश्चयम्॥२॥ * अन्वयार्थ : * (कायप्रमाणम्) शरीरप्रमाण (व्योमरूपम्। व्योमरूप या अमूर्तिक (निरञ्जनम्) * * निरंजन (चैतन्यम्) आत्मामाला दी कि निक)* भावना करनी चाहिये (निश्चयम्) इससे निश्चय ही (ज्ञानम्) ज्ञान को (प्राप्नोति) प्राप्त होता है । अर्थ : कायप्रमाण आत्मा को जो कि व्योमरूप तथा निरंजनरूप है, उस* चैतन्य आत्मा की भावना को जो सदैव करता है, वह निश्चित ही सम्यग्ज्ञान को प्राप्त करता है। * भावार्थ : इस कारिका में परम चैतन्यतत्त्व की भावना करने का फल * बताते हुए उस भावना को सदैव भाने का सदुपदेश दिया है। 1. करयाप्रमाण : जैनागम में आत्मतत्त्व के आकार का वर्णन करते *समय तीन प्रकार से कथन किया गया है- शरीरप्रमाण. लोकाकाशप्रमाण * और किंचित् न्यून। समस्त संसारी जीवों का आकार स्व-शरीरप्रमाण * * होता है। आचार्य श्री ब्रह्मदत्त ने लिखा है - यद्यपि निश्चयेन सहजशुद्धलोकाकाशप्रमितासंख्येय* प्रदेशस्तथापिव्यवहारेणानादिकर्मबन्धाधीनत्वेन शरीरनामक* मोदयजनितोपसंहार- विस्ताराधीनत्वात् घटादिभाजनस्थ प्रदीपयत् स्वदेहपरिमाणः। (बृहद् द्रव्यसंग्रह-२)* अर्थात् : यद्यपि जीव निश्चय से स्वभाव से उत्पन्न शुद्ध लोकाकाश के समान असंख्यात प्रदेशों का धारक है, तथापि शरीर नामकर्म के उदय ********** **********
SR No.090187
Book TitleGyanankusham
Original Sutra AuthorYogindudev
AuthorPurnachandra Jain, Rushabhchand Jain
PublisherBharatkumar Indarchand Papdiwal
Publication Year
Total Pages135
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size3 MB
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