SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 96
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir ज्ञानप्रदीपिका । उदय या चतुरस्र में यदि पाप ग्रह हों तो आठ दिन में, लग्न और द्वितीय में हों तो १४ दिन में, दशम में पाप ग्रह स्थित हों तो ३ दिन में और चतुर्थ में हों तो दश दिन में मृत्यु होगी । निधनारूढगे पापदृष्टे वा मरणं भवेत् । तत्तदुग्रहवशादेव दिनमासादिनिर्णयम् ||१३|| मृत्यु और आरूढ़ स्थान यदि पाप ग्रहों से दृष्ट हो तो मरण बताना। दिन महीने आदि का निर्णय ग्रहों पर से कर लेना । इति मरणकाण्डः ग्रहोच्चैः स्वर्गमायाति रिपौ मृगकुले भवः । नीचे नरकमायाति मित्रे मित्रकुलोद्भवः ||१|| स्वक्षेत्रे स्वजने जन्म मित्रं ज्ञात्वा वदेत् सुधीः । ४१ मृत्यु के समय मृत प्राणी को ग्रहों के उच्च के रहने पर स्वर्ग होता है शत्रु स्थान में रहने पर पशुयोनि में जन्म, मित्र गृह में रहने पर मित्र कुल में जन्म और स्वक्षेत्र में रहने पर स्वजनों में जन्म बताना चाहिये । इति स्वर्गकाण्ड: कथयामि विशेषेण मूकद्रव्यस्य लक्षणम् । पाकभाण्डानि भुक्तानि व्यंजनानि रसं तथा ॥ १॥ For Private and Personal Use Only अब मैं विशेष करके मूक द्रव्यों का निर्णय करता हूं। इस प्रकरण में पाक भाण्ड भुक, व्यंजन और इसका वर्णन होगा ।
SR No.090186
Book TitleGyan Pradipika
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRamvyas Pandey
PublisherNirmalkumar Jain
Publication Year1934
Total Pages159
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size9 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy