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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir ज्ञानप्रदीपिका। चन्द्रो माता पिताऽऽदित्यः सर्वेषां जगतामपि । गुरुशुक्रारमंदज्ञाः पंच भूतस्वरूपिणः ॥१॥ सारे जगत् को माता चन्द्रमा और पिता सूर्य हैं। बृहस्पति शुक्र मंगल शनि और बुध ये पांचो पंच महाभूत हैं। श्रोत्रत्वकचक्षरसनाघ्राणाः पञ्चेद्रियाण्यमी । शब्दश्पर्शी रूपरसौ गंधश्च विषया अमी ॥२॥ श्रोत्र ( कान ) त्वक् ( चर्म ) आंख, जीभ, घ्राण (नाक) ये पांच इन्द्रिय हैं। और शब्द स्पर्श, रूप, रस और गन्ध ये क्रमशः इनके विषय है। ज्ञानं गुर्वादिपंचानां ग्रहाणां कथयेक्रमात् । गुरोः पञ्च भृगोश्वाब्धिः त्रयं ज्ञस्य कुजस्य द्वे ॥३॥ एकं ज्ञानं शनेरुक्तं शास्त्र ज्ञानप्रदीपके । गुरु, शुक्र, मंगल, बुध और शनि इनका ज्ञान क्रमशः ५, ४, २, १, और ३ है। ऐसा ज्ञान प्रदापक शास्त्र का कहना है। भौमवर्गा इमे प्रोक्ताः शंखशुक्तिवराटकाः॥४॥ मत्कुणाः शिथिलायूकमक्षिकाश्च पिपीलिकाः । शंख, शुक्ति, कौड़ो, खटमल, जू , मक्खियां, चीटियां-ये भौमवर्ग अर्थात् मंगल के जीव हैं। बुधवर्गा इमे प्रोक्ताः षट्पदा ये भृगोस्तथा ॥५॥ देवा मनुष्याः पशवो विहगाः गुरोः । (2) तथैकज्ञानिनो वृक्षाः शनिवृक्षाः प्रकीर्तिताः ॥६॥ एकद्वित्रिचतुःपंचगगनादिगणाः स्मृताः। भौंरे बुधवर्ग में, देव मनुष्य शुक्र वर्ग में, पशु और पक्षी गुरु वर्ग में, और वृक्ष शनिवर्ग में कहे गये हैं x x x x X! For Private and Personal Use Only
SR No.090186
Book TitleGyan Pradipika
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRamvyas Pandey
PublisherNirmalkumar Jain
Publication Year1934
Total Pages159
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size9 MB
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