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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir ज्ञानप्रदीपिका । मेषकर्कितुलानकाः धातुराशय ईरिताः ॥ ५६|| कुंभसिंहालिवृषभाः श्रूयंते मूलराशयः । धनुर्मोनयुककन्या राशयो जीवसंज्ञकाः ॥५७॥ मेष, कर्क, तुला और मकर ये धातुराशियाँ हैं । कुंभ, सिंह, मूलराशियाँ हैं । धनु, मीन, मिथुन और कन्या ये जीवराशियाँ हैं I कुजेंदुसौरिभुजगा धातवः परिकीर्तिताः । मूलं भृगुर्दिनाधीशौ जीवौ धिषणसौम्यजौ ॥ ५८ ॥ वृश्चिक और स्वक्षेत्रभानुरुच्चंद्रो धातुरन्यश्च पूर्ववत् । स्वक्षेत्रभानुजो वल्ली स्वक्षेत्रधातुरिन्दुजः ॥५६॥ (१) इसी प्रकार मंगल, चन्द्रमा, शनि और राहु ये धातु ग्रह, शुक्र और सूर्य मूल ग्रह और बृहस्पति ये जोव ग्रह हैं । बुध वृष ये विशेषता यह है कि, सूर्य अपने गृह का, और चन्द्रमा उच्च का धातु होते हैं। शनि स्वक्षेत्र में मूल और 'बुध स्वक्षेत्र में धातु होता हैं, शेष ग्रह पूर्ववत् ही रहते हैं । ताम्रो भौमस्त्रपुर्शश्च कांचनं धिषणो भवेत् । रौप्य शुक्रः शशी कांस्य: अयसं मंदभोगिनौ ॥ ६० ॥ भौमार्कमंद शुकास्तु स्वस्व लोहस्वभावकाः । चन्द्रज्ञगुरवः स्वस्वलोहाः स्वक्षेत्रमित्राः ॥ ६१ ॥ मिश्र मिश्रफलं ज्ञात्वा ग्रहाणां च फलं क्रमात् । For Private and Personal Use Only मंगल, तामा, बुध त्रपु ( पीतल ? ), गुरु सोना, शुक्र चांदी, चंद्रमा कांसा, शनि राहु लोहे होते हैं । और मंगल सूर्य शनि शुक्र ये अपने २ भाव में लौइकार के होते हैं, चन्द्रमा बुध वृहस्पति अपने क्षेत्र तथा मित्र क्षेत्र में होने से लौहकारक कहे गए हैं। मिश्र में मिश्रित फल का आदेश क्रम से करना चाहिये ।
SR No.090186
Book TitleGyan Pradipika
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRamvyas Pandey
PublisherNirmalkumar Jain
Publication Year1934
Total Pages159
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size9 MB
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