SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 156
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir ( २१ ) शुष्क हस्तौ च पादौ च शुष्कांगी विधवा भवेत् । अमंगला च सा नारी धन्यधान्यक्षयंकरी ॥३६॥ शुष्क हाथ, सूखे पैर और सूखे शरीर वाली स्त्री विधवा होती है। यह अमंगला धन धान्य की संहारिणी होती है। पिंगाक्षी कूपगंडा प्रविरलदशना दीर्घजंघोर्ध्वकेशी । लम्बोष्ठी दीर्घत्रा खरपरुषरवा श्यामताम्रोष्ठजिह्वा: । शुष्कांगी संगता स्तनयुगविषमा नासिकास्थूलरूपा । सा कन्या वर्जनीया पतिसुतरहिता शीलचारित्र्यदूरा ||३७| जिस कन्या की आंखें पिंगल वर्ण की हों; कपोल से हुए हों; दाँत सुसज्जित रूप से न हों; जंधा लंबी हो; केश खड़े हों; ओंठ लंबे हों; मुंह लंबा हो; बोली कर्कश हो; तालु, होंठ और जीभ काली हों; शरीर सूखा हो; बात बात पर आंसू गिरता हो; दोनों स्तन समान न हो; नाक निपटी हो; उसके साथ विवाह नहीं करना चाहिये। क्यों कि वह पति और पुत्र से रहित होगी, उसके चरित्र भी दूषित होंगे। शृगालाक्षी कृशांगी च सा नारी च सुलोचना । धनहीना भवेत्साध्वी गुरुसेवापरायणा ||३८|| सियार की तरह आँखों वाली, पतले शरीर वाली, सुलोचना स्त्री धनहीन होती हुई भी साध्वी और गुरुजनों की सेवा करने वाली है । रक्तोत्पलदला नारी सुन्दरी गज-लोचना । हेमादिमणिरत्नानां भर्तुः प्राणप्रिया भवेत् ॥ ३६ ॥ कमल के पत्ते के समान हाथी जैसी आँखों वाली सुन्दरी रमणी, सुवर्ण मणि और रनों के स्वामी की प्राणप्रिया होती है। गुलीच या नारी दीर्घकेशी च या भवेत् । अमांगल्यकरी ज्ञेया धनधान्यक्षयंकरी ॥४०॥ बड़ी बड़ी अंगुलियों वाली, और दीर्घ केशों वाली औरत धन धान्य की नाशक तथा अमंगळ मयी है। For Private and Personal Use Only
SR No.090186
Book TitleGyan Pradipika
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRamvyas Pandey
PublisherNirmalkumar Jain
Publication Year1934
Total Pages159
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size9 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy