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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir खैर, श्वेताम्बर हो या दिगम्बर जैन साहित्य हो, इसे जैनीमात्र को अपनाना चाहिये । परन्तु यहाँ पर यह प्रश्न उठ सकता है कि मुद्रित वे ग्रन्थ अगर जैन हैं तो मंगलावरण का परिवर्तन कैसे ? मंगलाचरण एवं अन्तरंग कलेवर को कुछ उलट-पुलट कर जैनेतर विद्वानों के द्वारा प्रकाशित त्रिविक्रमदेवकृत प्राकृतव्याकरणादि कुछ जैनग्रन्थ हमलोगों के सामने उपस्थित हैं, अतः संभव है कि उन्हीं की तरह इसमें भी कुछ उलट पलट कर दी गयी हो। राय बहादुर हीरालाल एम० ए० ने भी स्वसम्पादित "Catalogue of Sanskrit and Prakrit Manuscripts in the central province and Berar" नामक विस्तृत प्रन्थसूची में इस ज्ञानप्रदीपिका को जैन ग्रन्थों में ही शामिल किया है। अब इस सम्बन्ध में प्रस्तुत ग्रन्थों के अन्दर भी स्थूलदृष्टि से एकबार नजर दौड़ाना श्रावश्यक प्रतीत होता है। "निर्दिष्टं लक्षणं चैव सामुद्रवचनं यथा"। (सा० शा० पृ० १ श्लोक ३ ) "शतवर्षाणि निर्दिष्टं नारदस्य बचो यथा"। ( , ,, ,, ४ ,, २१) "पुरुषत्रितयं हत्वा चतुर्थे जायते सुखम्"। ( , , , १८ , २७) इसी प्रकार-"प्रादित्यारौ पुनर्भूः स्यात्प्रश्ने वैवाहिके वधूः"। (ज्ञा० प्र० पृ० ४६ श्लोक १५ श्रादि ) मैं समझता हूँ कि उक्त श्लोकान्तर्गत कुछ सिद्धान्तों से कतिपय जैन विद्वान प्रस्तुत ग्रन्थों को जैनाचार्यों के द्वारा प्रणीत मानने का प्रायः तैयार नहीं होंगे। किन्तु इसीके उत्तर में अन्यान्य कई जैन विद्वानों का ही कहना है कि ज्योतिष, वैद्यक, मन्त्र, नीति आदि विषय लौकिक एवं सार्वजनिक हैं । अतः तद्विषयक वे ग्रन्थसर्वथा जैन दर्शन के अनुकूल ही नहीं हो सकते अर्थात् कुछ बाते प्रतिकूल भी हो सकती हैं। इस बातको पुष्ट करने के लिये वे विद्वान् भद्रबाहुसंहिता अर्हन्नीति आदि ग्रन्थों को उपस्थित करते हैं। उन्हीं विद्वानों का यह भी कहना है कि एतद्विषयक इन लौकिक ग्रन्थों में भिन्न भिन्न ग्रहों के योग से सुरापानवती, वेण्या, भ्रष्टा, व्यभिचारिणी, परपुरुषगामिनी आदि होती हैं, ऐसा भी उल्लेख मिलता है। इससे यह बात सिद्ध होती है कि सार्वजनिक लौकिक प्रन्थों में ये सब बातें उपलब्ध होना स्वाभाविक है। खैर, मतविभिन्नता सदा से चली आ रही है और चलती ही रहेगी। इस विषय में मुझे नहीं पड़ना है । अब अन्वेषक विद्वानों से मेरी यही प्रार्थना है कि मेरे द्वारा उपस्थित को हुई प्रस्तुत ये सामग्रियाँ उक्त अन्य जैनाचार्ग-प्रणोत निर्धान्त सिद्ध करने के लिये पर्याप्त नहीं हैं, अतः वे इस सम्बन्ध में विशेष खोज करके सबल प्रमाणों को विद्वानों के सामने उपस्थित कर इस विषय को हल कर दें। For Private and Personal Use Only
SR No.090186
Book TitleGyan Pradipika
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRamvyas Pandey
PublisherNirmalkumar Jain
Publication Year1934
Total Pages159
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size9 MB
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