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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-७९९ आगे विशेष का प्रमाण कहते हैं - लोगाणमसंखमिदा, अहियपमाणा हवंति पत्तेयं । समुदायेण वि तच्चिय, ण हि अणुकिट्टिम्मि गुणहाणी ।।९५५॥ अर्थ-प्रत्येकगुणहानिमें पूर्व-पूर्व गुणहानिसे अनुकृष्टिके चयका प्रमाण दूना-दूना है तथापि सामान्यसे असंख्यातलोकमात्र ही है और सर्वचय समूहोंको मिलानेसे भी असंख्यातलोकप्रमाण ही होता है। अनुकृष्टिमें गुणहानिकी रचना नहीं है। विशेषार्थ-विवक्षित गुणहानिकी रचनामें चयका जो प्रमाण है उसमें अनुकृष्टिगच्छका भाग देनेपर अनुकृष्टिचयका प्रमाण प्राप्त होता है। इसप्रकार स्थूलरूपसे वह असंख्यातलोकप्रमाण ही है। यहाँ प्रथमखण्डसे एक-एकचय अधिक द्वितीयआदि खण्ड हैं तथापि उन सभीका प्रमाण असंख्यातलोकप्रमाण ही कहा है। इसप्रकार असंख्यातलोकके भेद असंख्यातलोकप्रमाण हैं तथा अनुकृष्टिके गच्छमें गुणहानिकी रचना नहीं है। अत:सर्वउत्कृष्टखण्डोंके अपने-अपने जघन्यखण्डसे एककम गुणहानिके गच्छप्रमाण चयों की अधिकता पाई जाती है। इसप्रकार अनुकृष्टिके गच्छ और चयका प्रमाण बताकर उस अनुकृष्टिखण्डोंमें स्थितिबन्धाध्यवसायों का प्रमाण कहते हैं। जघन्यस्थितिबन्धके योग्य अध्यवसाय परिणाम तो द्रव्य जानना तथा प्रथम गुणहानिमें जो चयका प्रमाण है उसमें अनुकृष्टिगच्छ (पल्यके असंख्यातभागका) भाग देनेपर अनुकृष्टिचयका प्रमाण होता है तथा “व्येकपदार्धनचयगुणो गच्छ उत्तरधन" एककम अनुकृष्टिगच्छके आधेको अनुकृष्टिचयसे गुणे और अनुकृष्टिगच्छसे गुणे, जो प्रमाण हो वह यहाँ चयधन जानना । प्रथमगुणहानिमें जघन्यस्थितिसम्बन्धी स्थितिबंधाध्यवसायोंके प्रमाणमें से चयधनका प्रमाण घटानेसे अवशेषमें अनुकृष्टिगच्छका भाग देनेपर जो प्रमाण आवे वह प्रथमगुणहानिमें जघन्यस्थितिसम्बन्धी अनुकृष्टिका प्रथमखण्ड जानना । द्वितीयादिखण्ड एक-एक अनुकृष्टिचयसे अधिक होते हैं। एककम अनुकृष्टिके गच्छप्रमाणचय जघन्यखंडमें अधिक होनेपर उत्कृष्ट अन्तिमखण्ड होता है। यहां "पदहतमुखमादिधनं" अनुकृष्टिगच्छरूप पदसे प्रथमखण्डरूप मुखको गुणा करनेपर आदिधन प्राप्त होता है। इसप्रकार आदिधन और चयधन मिलानेसे जघन्यस्थितिसम्बन्धी अध्यवसायोंका प्रमाणरूप सर्वधन होता है इसीप्रकार द्वितीयादिस्थानों में अनुकृष्टिरचना अनुक्रमसे प्रथमगुणहानिके अन्त तक जानना। अब इस अनुकृष्टिके कथनको अंकसन्दृष्टिके द्वारा कहते हैं-- प्रथमगुणहानिके प्रथमस्थान ९ हैं। अनुकृष्टिगच्छ ४ का भाग ऊर्ध्वचय-१में देने पर अनुकृष्टि चतुर्थाश वहाँ 'व्येकपदार्धध्नचयगुणो गच्छ उत्तरधन" इस सूत्रसे चय धनके प्रमाण १५ को सर्वधन
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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