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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-७४७ ४०९६, असिद्धत्वके ८१९२, क्षायिक चारित्रके १६३८४, जीवत्वके ३२७६८, भव्यत्वके एकपण्णट्ठीप्रमाण, मनुष्यगतिके २ पण्णट्ठीप्रमाण, शुक्ललेश्याके चारपण्णट्टीप्रमाण और क्षायिकसम्यक्त्वके ८ पण्णीप्रमाण हैं। क्षायिकसम्यक्त्वके आठपण्णट्ठीप्रमाण भंगोंसे दून अर्थात् १६ पण्णट्टीप्रमाण एकलिंगसंबंधी भंग हैं इनको तीनवेदसे गुणा करनेपर (१६४३) ४८ पण्णट्ठीप्रमाण भंग हुए | एकलिंगसम्बन्धी भंगोंसे दूने ३२ पण्णट्ठीप्रमाण एक कषायके भंग हैं। इनको ३ वेदसहित चारकषायोंसे गुणा करे तो (३४४-१२)४३२४पण्णट्ठी ३८४ गुणी पण्णट्टीप्रमाण भंग हुए। इसप्रकार प्रत्येकपद १६ व पिंडपदके ४३२ भागोंको पिलानेसे ४४८ मे गुणिन पण्णवीण पाणमें एककम अपूर्वकरणगुणस्थानके क्षपकश्रेणीकी अपेक्षा सर्वपद भंग जानना। सवेदअनिवृत्तिकरणगुणस्थानमें भी अपूर्वकरणगुणस्थानवत् उपर्युक्त ४४८ पण्णट्टीप्रमाणमें से एककम भङ्ग हैं। अवेदअनिवृत्तिकरणगुणस्थानमें प्रत्येकपद २० हैं। मतिज्ञानका १, श्रुतज्ञानके २, अवधिज्ञानके ४, मनःपर्ययज्ञानके ८, चक्षुदर्शनके १६, अचक्षुदर्शनके ३२, अवधिदर्शनके ६४, दानलब्धिके १२८, लाभलब्धिके २५६, भोगलब्धिके ५१२, उपभोगलब्धिके १०२४, वीर्यलब्धिके २०४८, अज्ञानके ४०९६, असिद्धत्वके ८१९२, क्षायिकचारित्रके १६३८४, जीवत्वके ३२७६८, भव्यत्वके एकपण्णट्ठी, मनुष्यगतिके २ पण्णट्ठी, शुक्ललेण्याके ४ पण्णट्ठी और क्षायिकसम्यक्त्वके ८ पण्णट्टीप्रमाण भंग हैं। पिंडपदोंमें एककषायसंबंधीभग क्षायिकसम्यक्त्वके ८ पण्णट्ठीप्रमाण भंगोंसे दूने अर्थात् १६ गुणे पण्णट्ठीप्रमाण भंग हैं। इनको चारकषायसे गुणा करनेपर (१६x४) ६४ पण्णट्ठीप्रमाण भंग हैं। इसप्रकार प्रत्येकपदके १६ व पिंडपदके ६४ भंग मिलकर सर्वपदसंबंधीभंग ८० गुणीपण्णट्टीमें से एककम प्रमाण जानना। सूक्ष्मसापरायगुणस्थानमें प्रत्येकपद ही हैं, पिंडपद नहीं हैं। यहाँ मतिज्ञानका १, श्रुतज्ञानके २, अवधिज्ञानके ४, मन:पर्ययज्ञानके ८, चक्षुदर्शनके १६, अचक्षुदर्शनके ३२, अवधिदर्शनके ६४, दानलब्धिके १२८, लाभलब्धिके २५६, भोगलब्धिके ५१२, उपभोगलब्धि के १०२४, वीर्यलब्धिके २०४८, अज्ञानके ४०९६, असिद्धत्वके ८१९२, क्षायिकसंयमके ५६३८४, जोवत्वके ३२७६८, भव्यत्वके एकपण्णट्ठी, मनुष्यगतिके २ पण्णट्ठी, शुक्ललेश्याके ४ पण्णट्टी, क्षायिकसम्यक्त्वके ८ पण्णट्ठी एवं सूक्ष्मलोभके १६ पण्णट्टीप्रमाण भंगोंको मिलानेपर यहाँ ३२ पण्णट्टीमें से १ कम प्रमाण सर्वपदसंबंधी भंग जानना। क्षीणकषायगुणस्थानमें भी प्रत्येकपद ही हैं, पिंडपद नहीं हैं। यहाँ मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मन:पर्ययज्ञान, चक्षुदर्शन, अचक्षुदर्शन, अवधिदर्शन, दानलब्धि, लाभ, भोग, उपभोग, वीर्यलब्धि, अज्ञान, असिद्धत्व, संयम, जीवत्व, भव्यत्व, मनुष्यगति, शुक्ललेश्या और क्षायिकसम्यक्त्वरूप २० प्रत्येकपदोंके परस्परमें दूने-दूने भंग हैं अर्थात् क्रमसे १-२-४-८-५६-३२-६४-१२८-२५६-५१२
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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