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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-७४० क्षायिकसम्यक्त्वी तिर्यञ्च देशव्रती नहीं होता। प्रमत्त व अप्रमत्तगुणस्थानमें ४१४४ गुणकार है, उपशमश्रेणीके अपूर्वकरण तथा सवेदअनिवृत्तिकरणमें ८ कम एकहजार अर्थात् ९९२ हैं। कषायसहित और अवेदअनिवृत्तिकरणके भागमें १६८ गुणकार, सूक्ष्मसाम्परायमें ४८, उपशान्तकषायमें २४ गुणकार हैं। क्षपक अपूर्वकरण और अनिवृत्तिकरणके सवेदभागमें ४४८, अनिवृत्तिकरणके कषायसहित व वेदरहितभागमें ८० उससे आगे सूक्ष्मसाम्परायमें ३२ और क्षीणकषायमें १६ गुणकार हैं॥८६७ से ८७२।। इससे आगे सयोगी व अयोगोगुणस्थानके २५६ गुण्य तथा गुणकार सयोगी गुणस्थानमें ६४ और अयोगीगुणस्थानमें ३२ इसप्रकार गुण्यमें गुणकारोंके साथ गुणा करनेपर जो प्रमाण हो उस-उसमें एक कम करनेसे सर्वपदभंगोंका प्रमाण होता है। सिद्धोंमें गुण्य-गुणकारके भेदरहित शुद्ध ३१ सर्वपदरूप भंग नियमसे होते हैं। इसप्रकार सहायतारहित पराक्रमवाले श्रीवर्धमानतीर्थकर ने कहा है। . विशेषार्थ - यहाँ विवक्षित १५वे जीवपदके भंगोंके प्रमाणरूप इष्टधन १६,३८४ है जो कि 'पण्णट्टी' का चतुर्थांश है। इसको दूना करके उसमेंसे एक कम करनेपर प्रथमपदसे १५वें पदपर्यन्त सर्वपदोंके भंगोंका जोड़रूप प्रमाण ३२७६७ होता है तथा विवक्षित जीवपदमें इष्टधनका दूना ३२७६८ अर्थात् आधा ‘पण्णट्टी' प्रमाण है सो यह भव्यत्वरूप भावोंके भंग होते हैं और उतने ही अभव्यभावके भी भंग होते हैं तथा भव्यत्व और अभव्यत्वभावके मिलकर 'पण्णट्ठी' प्रमाण भंग होते हैं तथा इनको दूना करनेपर दो पण्णट्ठीप्रमाण भंग एक-एकगतिके होते हैं अर्थात् नरक, तिर्यञ्च, मनुष्य व देवगतिमें प्रत्येकके दो पण्णट्ठीप्रमाण ही भंग जानना। इसप्रकार चारों गतिसम्बन्धीभंग (दो पण्णट्टी-४) आठगुणी पण्णी प्रमाण हैं। एक लिंगसम्बन्धीभंग उपर्युक्त एकगतिसम्बन्धी भंगोंसे दुगुणे अर्थात् चारपण्णट्ठी प्रमाण हैं। यहाँ चारोंगतिमें पाये जानेवाले लिंगों की संख्या (नरकगतिमें १, तिर्यञ्चगतिमें ३. मनुष्यगतिमें ३ और देवगतिमें २) ९ है अत: (९४४ पण्णट्टी) ३६ गुणी पण्णठ्ठीप्रमाण लिंगसम्बन्धी सर्वभंग हैं। उपर्युक्त एकलिंगसम्बन्धी चौगुणी पण्णट्टीप्रमाण भंगोंको दूना करने पर एककषायसम्बन्धी आठगुणीषण्णट्ठीप्रमाण भंग होते हैं सो इसको नरकगतिमें एकलिंगसहित चारकषाय (१४४) अर्थात् ४ से गुणा करे, तिर्यञ्चगतिमें तीनलिंगसहित चारकषाय (३४४) अर्थात् १२ से गुणा करे, मनुष्यगतिमें तीनलिंगसहित चारकपाय (३४४) से गुणा करे तथा देवगतिमें दो लिंगसहित चारकयाय (२४४) अर्थात् ८ से गुणाकरे तो भंगोंकी संख्या प्राप्त होती है सो चारोंगतियोंमें लिंग व कषायके सयोगसे सर्वमिलकर आठगुणी ३६ पण्णट्टीप्रमाण भंग जानना जो कि पण्णट्ठीसे २८८ गुणे होते हैं। एककषायके आठगुणी पण्णट्ठीप्रमाण भंगोंको दूना करनेपर एकलेश्यासम्बन्धी भंग होते हैं जो १६ गुणी पण्णवीप्रमाण हैं। इनको नरकगतिमें एकलिंग व चारकषायसहित तीनलेश्या (१४४४३) अर्थात् ५२ से गुणा करे, तिर्यञ्चगतिमें ३ लिंग व चारकषायसहित ६ लेश्या (३४४४६) अर्थात् ७२ से, मनुष्यगतिमें भी इसीप्रकार ३ लिंग
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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