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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-७३७ यहाँ जीवपद १५वाँ है अतः गच्छका प्रमाण १५ जानना | २ कम गच्छका एकबार संकलन स्नेके लिए पर्वोक्त सत्रानसार १३व१४का परस्पर गणाकरके दोवएकको परस्पर गणनेसओ लब्ध आवे उससे भाग देनेपर १३४१४=१.८२२४१-९१ लब्धराशि हुई सो यह २ कम गच्छका एकबार संकलनका प्रमाण है। इसीप्रकार तीनकम गच्छका दो बार संकलन करनेके लिए १२-१३ व १४का परस्पर गुणा करके ३-२ व १ का गुणाकरनेसे प्राप्तराशिका भाग देनेसे (१२४१३४१४३२१.८४५३४२४१) ३६४ हुए | चारकम गच्छका तीनबार संकलन करनेके लिए ११-१२-१३ व १४ का परस्परमें गुणाकरके उसमें ४४३४ २४१ को परस्परमें गुणने से प्रामराशि द्वारा भागदेने पर (११४१२४१३४१४३२४०२४४४३४२४१) १००१ लब्ध आया। पाँचकम गच्छका चारबार संकलन करनेके लिये १०-११-१२-१३ व १४ को परस्पर गुणा करनेपर तथा लब्धराशिमें ५-४-३-२ व १ का परस्परमें गुणाकरके प्राप्त गुणनफलका भाग देनेप्से (१०x११४१२४१३४१४-२,४०,२४०५४४४३४२४१) २००२ होते हैं। ६ कम गच्छका पाँचबार संकलन करनेके लिए ९-१०-१४-५३१३ व १४ का परस्पर गुणा करनेसे तथा लब्धराशिमें ६४५४४४३४२४१ का परस्परमें गुणाकरनेसे प्राप्त गुणनफलका भागदेनेसे (९४१०४११४१२४१३४१४-२१,६२,१६०७२०) ३७०३ होते हैं। ७ कम गच्छका छहबार संकलन करनेके लिए ८-९-५०-११-१२-१३ व १४ को परस्पर गुणाकरके लब्धमें ७-६-५-४-३-२ व १ का परस्पर गुणाकरके प्राप्त गुणनफलसे भागदेने पर (८४९x१०४११४१२४१३४१४-१,७२, ९७,२८०.७४६४५४४४३४२४१(५०४०)-३४३२ होते हैं। इसप्रकार १५वें जीवपदमें पाए जानेवाले भंग निकालनेका विधान कहा। आगे भङ्गों को मिलाने के लिए गाथासूत्र कहते हैं इठ्ठपदे रुऊणे, दुगसंवग्गम्मि होदि इट्ठधणं। असरित्थाणंतधणं दुगुणेगूणे सगीयसव्वधणं ।।८६१ ॥ अर्थ -- विवक्षितपदमें एक कम करनेसे जो शेष रहे उतने दो-दोके अङ्क लिखकर परस्परसवर्ग करनेसे (आपसमें गुणाकरनेसे) विवक्षित पदमें भंगोंका प्रमाणरूप इष्टधन होता है उस इष्टधनको दूना करके उसमें से ५ घटानेसे जो प्रमाण हो उतना प्रथमपदसे लेकर विवक्षित पदतक सर्वपदोंके भंगोंका जोड़रूप सर्वधन होता है। विशेषार्थ – जितनेवाँ विवक्षित पद हो उसमेंसे एक घटाकर जितने शेष बचें उतनी बार दो का अङ्क लिखकर परस्पर गुणा करके विवक्षितपदमें भंगोंका प्रमाणरूप इष्टधन होता है। जैसे यहाँ विवक्षित १५वाँ जीवपद है उसमेंसे एक कम किया तो (१५-१) १४ हुए सो १४ स्थानोंपर २ का अङ्क लिखकर परस्पर गुणा करनेपर १६,३८४ हुए सो इतना ही १ वें जीवपदमें भंगोंका प्रमाण है तथा उस इष्टधनको
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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