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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-६१५ कषायमार्गणा में बन्ध-उदय व सत्त्वस्थानसम्बन्धी सन्दृष्टिमार्गणा | बन्ध- | बन्धस्थानगत | उदय- | उदयस्थानगत प्रकृति- सत्त्व. सत्त्वस्थानगन प्रकृति स्थान प्रकृति-संख्या का | स्थान ! संख्या का विवरण | संख्या ।! विवरण संख्या | विवरण संख्या संख्या संख्या कषायमार्गणा २३-२५-२६ -२८-२९-३० | ९ | २१-२४-२५-२६- | २७-२८-२९-३० | ९३-९२-९१-९० - ८८-८४-८२-८०-७९-७८ व ७७ प्रकृतिक अब ज्ञानमार्गणा में बन्ध-उदय और सत्त्वस्थान का कथन करते हैं-.. अण्णाणदुगे बंधो आदीछ णउंसयं व उदयो दु। सत्तं दुणउदिछक्कं विभंगबंधा हु कुमदिं व ।।७२३ ।। उदया उणतीसतियं सत्ता णिरयं व मदिसुदोहीए। अडवीसपंच बंधा उदयो पुरिसं व अट्टेव ॥७२४ ।। पढमचऊ सीदिचऊ सत्तं मणपजवम्हि बंधंसा। ओहिं व तीसमुदयं ण हि बंधो केवले णाणे ॥७२५॥ उदओ सव्वं चउपणवीसूणं सीदिछक्कयं सत्तं । अर्थ – ज्ञानमार्गणाके कुमति-कुश्रुतज्ञानमें २३ आदि प्रकृतिरूप छह बन्धस्थान, उदयस्थान नपुंसकवेदवत् ९, सत्त्वस्थान ९२ आदि प्रकृतिरूप छह हैं। विभङ्गज्ञानमें बन्धस्थान तो कुमतिज्ञानवत् ६, उदयस्थान २९ आदि प्रकृतिरूप तीन एवं सत्त्वस्थान नरकगतिके समान हैं। मति-श्रुत-अवधिज्ञानमें बन्धस्थान २८ आदि प्रकृतिरूप पाँच, उदयस्थान पुरुषवेदके समान आठ और सत्त्वस्थान ९३ आदि प्रकृतिरूप चार एवं ८० आदि प्रकृतिरूप चार इसप्रकार आठ हैं। मन:पर्ययज्ञानमें बन्ध और सत्त्वस्थान तो अवधिज्ञानके समान हैं, किन्तु उदयस्थान ३० प्रकृतिरूप एक ही है। केवलज्ञानमें बन्धस्थानका तो अभाव है, उदयस्थान २४ व २५ प्रकृतिक स्थानबिना शेष सभी और सत्त्वस्थान ८० आदि प्रकृतिरूप
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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