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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-६११ हैं। विकलेन्द्रिय जीवोंमें बन्धस्थान एकेन्द्रियवत् पाँच, उदयस्थान २१-२६-२८-२९-३० व ३१ प्रकृतिरूप छह और सत्त्वस्थान एकेन्द्रियवत् पाँच हैं। सकलेन्द्रिय जीवोंमें बन्धस्थान सभी हैं, उदयस्थान २०-२१-२५-२६-२७-२८-२९-३०-३१-२ व ८ प्रकृतिरूप ५५ एवं सत्चस्थान सभी हैं। इन्द्रियमार्गणा में बन्ध-उदय-सत्त्वस्थानसम्बन्धी सन्दृष्टिइन्द्रिय- बन्ध- | बन्धस्थानगत उदय- उदयस्थानगत | सत्त्व- सत्वस्थानमत मार्गणा स्थान | प्रकृतिसंख्या का | स्थान | प्रकृतिसंख्या का स्थान | प्रकृतिसंख्या का संख्या | विवरण संख्या विवरण संख्या | विवरण एकेन्द्रिय | ५ | २३-२५-२६-२९| ५ | २१-२४-२५-२६ । ५ ९२-१०-८८-८४ व २७ व ८२ विकलेन्द्रिय | ५ |२३-२५-२६-२९| ६ | २५-२६-२८-२९ व ३० ३० व ३१ प्रकृतिक 1९२-१०-८८-८४ व ८२ सक्लेन्द्रिय | ८ |२३-२५-२६-२८- ११ | २०-२१-२५-२६- १३ |९३-१२-९१-९०. |२९-३०-३१ व १/ २७-२८-२९-३० ८८-८४-८२-८०३१-२ व ८ प्रकृतिक ७९-७८-७७-१० व ९ प्रकृतिक प्रकृतिक अब कायमार्गणा में नामकर्मके बन्ध-उदय व सत्त्वस्थानसम्बन्धी कथन करते हैं पुढवीयादीपंचसु तसे कमा बंधउदयसत्ताणि। एयं वा सयलं वा तेउदुगे णत्थि सगवीसं ॥७१७ ।। अर्थ – कायमार्गणामें पृथ्वीआदि पाँच स्थावरकायोंमें बन्ध-उदय व सत्त्वस्थान एकेन्द्रियवत् जानना, किन्तु विशेषता यह है कि तेजकाय-वायुकायके जीवोंमें २७ प्रकृतिक उदयस्थान नहीं है, क्योंकि वह उदयस्थान आतप व उद्योतसहित है और इन दोनों प्रकृतिका उदय तेजकायिक-वायुकायिक जीवोंमें नहीं पाया जाता है। त्रसकायमें बन्धउदय व सत्त्वस्थानका कथन पञ्चेन्द्रियजीवोंके समान है।
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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