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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-६०७ क्षीणकषाय सयोगकेवली ४ |८०-७९-७८ व ७७ ४ |८३-७९-७, ७७ प्रकृति. अयोगकेचली ६ ८०-७९-७८-७७ अब १४ जीवसमासों में बन्ध-उदय और सत्त्वस्थान ६ गाथाओं में कहते हैं पणदेपणा पण धयानं बंधुदयसत्त पणगं च । पणछक्कपणगछछक्कपणगमट्ठमेयारं ॥७०४॥ सत्तेव अपज्जत्ता सामी सुहमो य बादरो चेव । वियलिंदिया य तिविहा होति असण्णी कमा सण्णी ॥७०५ ।जुम्मं ।। अर्थ - अपर्याप्तसम्बन्धी सात जीवसमासोंमें बन्धस्थान ५, उदयस्थान २ एवं सत्त्वस्थान ५ हैं, सर्व सूक्ष्मजीवोंमें बन्धस्थान ५, उदयस्थान ४ तथा सत्त्वस्थान ५ हैं, एकेन्द्रिय सर्व बादरजीवोंमें बन्ध-उदय व सत्त्वस्थान पाँच-पाँच हैं, विकलत्रय जीवोंमें बन्धस्थान ५, उदयस्थान ६ और सत्वस्थान ५ हैं, असञी जीवोंमें बन्धस्थान ६, उदयस्थान भी ६ तथा सत्त्वस्थान ५ हैं, सञ्जीजीवोंमें बन्धस्थान ८, उदयस्थान ८ एवं सत्त्वस्थान ११ जानना। उपर्युक्त कथन का विशेष स्पष्टीकरण करते हैंबंधा तियपणछण्णववीसत्तीसं अपुण्णगे उदओ। इगिचउवीसं इगिछव्वीसं थावरतसे कमसो ।७०६ ।। बाणउदीणउदिचऊ सत्तं एमेव बंधयं अंसा। सुहुमिदरे वियलतिये उदया इगिवीसयादिचउपणयं ॥७०७॥ इगिछक्कडणववीसत्तीसिगितीसं च वियलठाणं वा। बन्धतियं सण्णिदरे भेदो बन्धादि हु अडवीसं ॥७०८ ॥ सण्णिम्मि सव्वबंधो इगिवीसप्पहुदिएक्कतीसंता । चउवीसूणा उदओ दसणवपरिहीणसव्वयं सत्तं ॥७०९॥कुलयं ॥
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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