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________________ ७ प्रकृतिक ७ प्रकृतिक ७ प्रकृतिक ६ प्रकृतिक १ ३ १ गोम्मटसार कर्मकाण्ड - ६०२ २८ प्रकृतिक २४- २३ व २२ प्रकृतिक | २१ प्रकृतिक ५ | २८-२४-२३-२२ व २१ प्रकृतिक ३ २ ३ 28-१३ ८ १ प्रकृतिक । प्रकृतिक उदयस्थान अनन्तानुबन्धीरहित मिथ्यात्वमें भय - जुगुप्सारहित सासादनमें, भयजुगुप्सा से किसी एक सहित मिश्रमें, वेद व उपशमसम्यग्दृष्टि असंयत में और वेदक व उपशमसम्यग्दृष्टि देशसंयत में तथा वेदकसम्यक्त्वी प्रमत्त अप्रमत्तगुणस्थान में होता है । ७ १७- १३ व ९ प्रकृतिकस्थान क्रमसे असंयत, देशसंयत और प्रमत्तअप्रमत्तगुणस्थान में। प्रकृतिक । १७ व १.३ क्षायिक सम्यक्त्वी जीवके असंयतगुणस्थान में १७ प्रकृतिक तथा देशसंयतवर्ती क्षायिकसम्यक्त्वी मनुष्यके १३ प्रकृति का बन्ध होता है । १७- १३ व ९ प्रकृतिक । असंयतसे अपूर्वकरण गुणस्थानपर्यन्त ६ प्रकृति का उदय है। असंयतगुणस्थान में उपशम व क्षायिक सम्यग्दृष्टिके - ६ प्रकृतिका उदय है। तथा देशसंयतप्रमत्त अप्रमत्त व अपूर्वकरणगुणस्थानमें उपशम व क्षायिकसम्यक्त्वीके ५ प्रकृतिका उदय एवं वेदकसम्यक्त्वमें मिध्यात्व का क्षय करके २३ प्रकृति की सत्ता होनेपर और सम्यग्मिथ्यात्वका भी क्षय करके २२ की सत्ता होनेपर ६ प्रकृति का उदय है। -
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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