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गोम्मटसार कर्मकाण्ड-५३२
१४८= १४८= १४८= १४८= १४१= १४१= १४१ = १४१८...
अब भुजकारादि भंगोंको एकत्र करके कहते हैं
सव्वपरट्ठाणेण य अयदपमत्तिदरसव्वभंगा ह।
मिच्छस्स भङ्गमज्झे मिलिदे सव्वे हवे भंगा ।।५७९ ॥ अर्थ – सर्व परस्थानों तथा 'च' शब्दसे स्वस्थान-स्वस्थान और स्व-परस्थानसहित असंयत और अप्रमत्तादिगुणस्थानोंके जो सर्वभुजकारादि भंग हैं उनको मिथ्यादृष्टिके भंगोंमें मिलानेपर नामकर्मके भुजकारादिभंग नियमसे जानना। आगे उन भङ्गोंकी सिद्धिका उपाय दो गाथाओंसे कहते हैं
भुजगारा अप्पदरा हवंति पुव्ववरठाणसंताणे।
पयडिसमोऽसंताणोऽपुणरुत्तेत्ति य समुद्दिट्टो ।।५८०॥ अर्थ- पूर्वमें अल्पप्रकृतियोंको बाँधता था, पश्चात् अधिकप्रकृतियोंको बाँधने लगा इसप्रकार लगानेपर भुजकार कहलाता है तथा पूर्वमें अधिकप्रकृतियों को बाँधता था पश्चात् अल्पप्रकृतियोंको बाँधने लगा सो यह अल्पतर कहलाता है। प्रकृतियोंकी समान संख्या होनेपर भी प्रकृतिसमुदाय प्रकृतिभेदसहित अर्थात् भित्रप्रकृतिरूप हो तो वह अपुनरुक्त भंग कहलाता है। जिसप्रकार तीर्थंकरप्रकृतिबिना संहननसहित भी २९ प्रकृतिक स्थानका बन्ध है तथा तीर्थंकरसहित संहननबिना भी २९ प्रकृतिक स्थान है इसप्रकार इनमें २९ प्रकृतिकी समानता होते हुए भी तीर्थंकर और संहननके भेदसे अपुनरुक्तता कही गई है। अथानन्तर अवक्तव्यभंगोंका कथन करते हैं
'पडिय मरियेक्कमेक्कूणतीस तीसं च बंधगुवसंते।
बंधो दु अवत्तव्वो अवट्टिदो बिदियसमयादी ।।५८१ ।। अर्थ – उपशान्तकषायगुणस्थानमें नामकर्मकी किसी भी प्रकृतिको नहीं बाँधता था पश्चात्
१. यद्यपि अभी तक मुद्रित गोम्मटसार कर्मकाण्डकी प्रतियोंमें यह गाथा ५८२ नं. पर ही छपी है. किन्तु प्रकरणकी क्रमबद्धताको देखते हुए गाथाओंके क्रममें इस गाधाका पाठ यहीं ५८१ नं. पर उचित प्रतीत होता है इसलिए क्रममें परिवर्तन किया गया है।