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गोम्मटसार कर्मकाण्ड-५२०
कहलाता है। पहले अधिक प्रकृतियाँ बाँधता था पीछे अल्पप्रकृतियाँ बाँधे तो यह अल्पतरबन्ध है। जितनी प्रकृतियाँ पूर्वमें बँधतो थीं पथात भी उतनी ही पकलियाँ डोरो लाइ अवस्थितन्ध है। ये भुजकारादिबन्ध अविरुद्ध बन्धस्थानोंसे उत्पन्न होते हैं अत: उनकी उत्पत्तिके क्रमको भनोसहित आगेकी गाथामें कहेंगे।
भूबादरतेवीसं बंधतो सब्वमेव पणवीसं।
बंधदि मिच्छादिट्ठी एवं सेसाणमाणेजो॥५६५ ॥ अर्थ- बादर पृथ्वीकायादि जीव २३ प्रकृतिरूप स्थानके सर्वभंगोंका बन्ध करते हुए २५ प्रकृतिरूप स्थानके सभी भङ्गोंको बांधते हैं सो एक यह भुजगारबन्ध है। इसीप्रकार मिथ्यादृष्टिके नामकर्मसम्बन्धी शेष सभी बन्धस्थानोंमें भी बन्धके भङ्ग जानने चाहिए।
जसकित्ती बंधतो अडवीसाई ह एकतीसंता। तेवीसाई बंधइ तीसंता हवंति भुजयारा ॥२५८ ।।
इगितीसंता बंधड़ बंधतो अट्ठवीसाई। अर्थ- एक यश कीर्तिका बन्ध करता हुआ अट्ठाईसप्रकृतिको आदि लेकर इकतीसप्रकृतिपर्यन्तके स्थानोंका बन्ध करता है। इसीप्रकार २३ आदि प्रकृतिक स्थानोंका बन्ध करनेवाला जीव २५ प्रकृतिक स्थानको आदि लेकर तीसप्रकृतिक स्थानपर्यन्त स्थानोंको बांधता है तथा २८ आदि प्रकृतिक स्थानोंको बाँधता हुआ जीव २९ प्रकृतिक स्थानको आदि लेकर ३१ प्रकृतिक स्थानपर्यन्त स्थानोंका बन्ध करता है। इसप्रकार नामकर्मके २२ भुजकारबन्धस्थान होते हैं। भुजकार बन्धस्थानोंकी अङ्कसन्दृष्टि इसप्रकार
स्वस्थान भुजकारबन्धस्थान संख्या ४
५
४
३
३
२
१
१ २८ २९ ३० ३१
३० ३१
२३ २५ २६ २८ २९
२५ २६ २८ २९ ३०
२६ २८ २९ ३०
२८ २९ ३० ३१
२९ ३० ३१