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गोम्मटसार कर्मकाण्ड - ३३८
अर्थ- मिथ्यात्वादि १४ गुणस्थानों में से क्रम से सर्व तीन कम, एक कम, सर्व, एक कम आगे ६ गुणस्थानों में दो कम, पुनश्च उपशमश्रेणी के चारगुणस्थानों में छह कम, क्षपकश्रेणी की अपेक्षा दो गुणस्थानों में १० कम आगे के दो गुणस्थानों में अर्थात् सूक्ष्म साम्पराय और क्षीणमोह गुणस्थान में क्रम से ४६ व ४७ कम तथा ६३ कम प्रकृतिरूप सत्त्व जानना तथा 'च' शब्द से अयोगकेवली के १३५ कम प्रकृति का सत्त्व जानना ।
सयोगकेवली
गुणस्थान में जिन ६३ प्रकृतियों का सत्त्व नहीं रहता उनके नाम कहते हैं
घाई तियउज्जीवं थावरवियलं च ताव एइंदी | णिरय-तिरिक्ख दु सुहुमं साहरणे होइ तेसट्ठी || ३६०क।
अर्थ- चार घातिया कर्मों की ४७ प्रकृतियाँ, मनुष्यायुविना शेष तीन आयु, उद्योत, स्थावर, विकलत्रय, (द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय) आतप, एकेन्द्रियजाति, नरकगति - नरकगत्यानुपूर्वी, तिर्यञ्चगति - तिर्यञ्चगत्यानुपूर्वी, सूक्ष्म और साधारण । ये ६३ प्रकृतियाँ हैं, जिनका सत्त्व केवली भगवान के नहीं पाया जाता है ।
विशेषार्थ - मिथ्यात्वगुणस्थान में १४८ प्रकृति का सत्त्व, सासादनगुणस्थान में तीर्थङ्कर और आहारकद्विक इन तीन बिना १४५ प्रकृति का, मिश्रगुणस्थान में तोर्थङ्करप्रकृतिबिना १४७ प्रकृति का, असंयतगुणस्थान में १४८ प्रकृति का, देशसंयतगुणस्थान में नरकायुबिना १४७ प्रकृति का, प्रमत्तादि छह गुणस्थानों में नरकायु और तिर्थञ्चायु के बिना १४६ प्रकृति का सत्त्व है, किन्तु उपशमश्रेणी के अपूर्वकरणादि चार गुणस्थानों में पूर्वोक्त नरकक- तिर्यञ्चायु तथा अनन्तानुबन्धी ४ कषाय के बिना १४२ प्रकृति का सत्त्व है। क्षपकश्रेणी की अपेक्षा अपूर्वकरणादि दो गुणस्थानों में नरकायु, तिर्यञ्चायु, देवायु, दर्शनमोह की तीन और अनन्तानुबन्धीचतुष्क इन १० प्रकृतिबिना १३८ प्रकृति का सत्त्व है । अनिवृत्तिकरणगुणस्थान में व्युच्छिन्नप्रकृति (१६+८+१+१+६+१+१+१+१) ३६ तथा पूर्वोक्त नरकायु आदि १० (३६+१०) इन ४६ प्रकृतिबिना सूक्ष्मसाम्परायगुणस्थान में १०२ प्रकृति का सत्त्व है । क्षीणकषायगुणस्थान में लोभसहित ४७ प्रकृतिबिना १०१ प्रकृति का सत्व है । सयोगी और अयोगीगुणस्थान में घातियाकर्म की ४७ प्रकृति, नामकर्म की १३ और मनुष्यायुबिना शेष तीनआयु इन ६३ प्रकृति बिना ८५ प्रकृति का सत्त्व है। 'चकार' से अयोगीगुणस्थान के अन्तसमय में १३५ प्रकृतिबिना १३ प्रकृति का सत्त्व है। इस प्रकार गुणस्थानों में प्रकृतियों का सत्त्व जानना ।