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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड - ३२६ अर्थ - चारोंगतिवाले मिथ्यादृष्टिजीवों के चारप्रकृतियाँ, एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय एवं चतुरिन्द्रियजीवों के ६ प्रकृतियाँ और तेजकाय व वायुकाय में तीनप्रकृतियाँ उद्वेलनयोग्य हैं तथा अपने स्थान में स्थान में कचित् सत्व है और कथाचित् सत्त्व नहीं है। विशेषार्थ - तीर्थङ्कर, नरकायु व देवायु की सत्ता जिसके नहीं है ऐसे चतुर्गतिवाले संक्लेशपरिणामी मिथ्यादृष्टि जीव के उद्वेलना हुए बिना सत्त्व तो १४५ प्रकृति का है तथा आहारकद्विक की उद्वेलना होने पर १४३ प्रकृति का सत्त्व ', सम्यक्त्वप्रकृति की उद्वेलना होने पर १४२ प्रकृति का सत्त्व, मिश्रमोहनीय ( सम्यग्मिथ्यात्व ) की उद्वेलना होने पर १४९ प्रकृति का सत्त्व पाया जाता है। इस प्रकार स्वस्थानों में सत्त्व जानना तथा उत्पन्नस्थान में एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय, पृथ्वी जल और वनस्पतिकाय में पूर्वोक्तप्रकार से १४५ १४३-१४२-१४९ का सत्त्व है तथा देवगति व देवगत्यानुपूर्वी इन दो प्रकृतियों की उद्वेलना होने पर स्वस्थान में इन एकेन्द्रियादि के १३९ प्रकृति का सत्त्व है और नरकद्विकवैक्रियिकद्विक अर्थात् इन चार की उद्वेलना होने पर स्वस्थान में १३५ प्रकृति का सत्त्व है एवं उत्पन्नस्थान में तेजकाय व वायुकाय में मनुष्य आयु का भी सत्त्व नहीं है। अतः उद्वेलना हुए बिना सत्त्व १४४ प्रकृति का है तथा आहारकद्विक की उद्वेलना होने पर क्रम से १४२ - १४१-१४० प्रकृति का सत्त्व, देवगति व देवगत्यानुपूर्वी की उद्वेलना होने से १३८ प्रकृति का सत्त्व पाया जाता है, नारकचतुष्क (नरकगतिनरकगत्यानुपूर्वी, वैक्रियिकशरीर, वैक्रियिकअनोपान) की उद्वेलना होने से १३४ प्रकृति का सत्त्व पाया जाता है, तथा स्वस्थान में तेजकाय, वायुकाय के उच्चगोत्र की उद्वेलना होने पर सत्त्व १३३ प्रकृति का है एवं मनुष्यद्विक की उद्वेलना होने पर सत्त्व १३१ प्रकृति का है। ये अन्तिम दो सत्त्व (१३३ - १३१ का) उत्पन्न स्थान में एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय, पृथ्वी, जल और वनस्पतिकाय में भी जानना । यहाँ पूर्वपर्याय में उद्वेलन होकर अथवा उद्वेलना के बिना जो सत्त्व है उसके साथ उत्तरपर्याय में उत्पन्न होते समय उस उत्तरपर्याय में जो सत्त्व है उसे उत्पन्नस्थान १. संवत, असंयतावस्था को प्राप्त होकर अन्तर्मुहूर्त में आहारकद्विक की उद्वेलना प्रारम्भ करता है। जब तक वह असंयत रहता है तब तक वह उद्वेलना करता है। (ध. पु. १६ पृ. ४९८ ) २. शंका - गोम्मटसार कर्मकाण्ड गाथा ३५१ बड़ी टीका तेजकाय वायुकाय के उत्पन्न स्थान विषे १४४ की सत्ता और उद्वेलना करने पर १३१ की सत्ता बतलाई है। तो क्या वहाँ पर १४४ की सत्ता से भी मरण कर सकता है ? हमारी यह शंका है कि तेजकाय वायुकाय का जीव उद्वेलना प्रकृतियों में से प्रारम्भ की १० प्रकृतियों का तो नियम करके उद्वेलना करेगा ही, क्या यह ठीक है? समाधान - १४४ प्रकृतियों की सत्ता के साथ जीव तेजकाय व वायुकाय में उत्पन्न होकर क्षुद्रभव ग्रहण मात्र काल के पश्चात् १४४ प्रकृतियों की सत्ता के साथ मरण करके अन्य काय में उत्पन्न हो सकता है। यदि वह दीर्घकाल तक तेजकायवायुका में भ्रमण करता रहे तो १३ प्रकृतियों की उद्वेलना कर १३१ प्रकृतियों के साथ अन्य काय में उत्पन्न हो सकता है। १० प्रकृतियों की उद्वेलना करने के पश्चात् ही तेजकाथ, वायुकाय से निकलता है, ऐसा कोई नियम नहीं है।
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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