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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-२९९ सम्यग्मिथ्यात्व (मिश्र) में मिश्रगुणस्थानवत् उदययोग्यप्रकृति १०० हैं तथा गुणस्थान एक मिश्र ही है। सासादनसम्यक्त्व में सम्यम्मेिथ्यात्व, सम्यक्त्व आहारकद्विक और तीर्थकर तथा नरकगत्यानुपूर्वी इन ६ बिना उदययोग्यप्रकृति १११ हैं, गुणस्थान एक सासादन ही है। मिथ्यात्व में सम्यग्मिथ्यात्व, सम्यक्त्व, आहारकद्विक और तीर्थङ्कर इन ५ प्रकृतियों के बिना उदययोग्य ११७ प्रकृति तथा गुणस्थान एक मिथ्यात्व ही है। "इति भव्य-सम्यक्त्वमार्गणा" अथ सञ्जीमार्गणा अथानन्तर सञ्जीमार्गणा में उदयादि का कथन करते हैं सेसाणं सगुणोघं सण्णिस्सवि णस्थि तावसाहरणं । थावरसुहुमिगिविगलं असण्णिणोवि य ण मणुदुच्वं ॥३३०॥ वेगुव्वछ पणसंहदिसंठाण सुगमण सुभग आउतियं । अर्थ- शेष सम्यग्मिथ्यात्व, सासादन व मिथ्यात्व इन तीन में अपने-अपने गुणस्थान के समान उदयादि जानना। (इसका कथन सम्यक्त्वमार्गणा में किया जा चुका है।) सामान्य से उदययोग्य १२२ प्रकृति में से आतप, साधारण, स्थावर, सूक्ष्म, एकेन्द्रिय, विकलेन्द्रियत्रय और तीर्थङ्कर इन ९ प्रकृति बिना सञ्जीमार्गणा में उदययोग्य प्रकृति ११३ हैं। असञ्जी के मनुष्यगति व मनुष्यगत्यानुपूर्वी, उच्चगोत्र, वैक्रियिकषट्क, आदि के पाँच संहनन, आदि के पाँच संस्थान, प्रशस्तविहायोगति, सुभगादि तीन, नरकादि तीन आयु ये २६ प्रकृतियाँ उदययोग्य नहीं हैं। इसकारण सामान्य से मिथ्यात्वगुणस्थान सम्बन्धी ११७ प्रकृतियों में से उपर्युक्त २६ प्रकृतियाँ घटाने पर उदययोग्य ९१ प्रकृतियाँ हैं। विशेषार्थ- सञ्जीमार्गणा में उदययोग्य प्रकृति ११३, गुणस्थान मिथ्यात्व से क्षीणमोहपर्यन्त १२ । सयोगकेवली और अयोगकेवली भी भावमनरहित हैं इसलिए सञी नहीं हैं तथा तिर्यञ्चों के बिना अन्यत्र असञ्जीपना नहीं पाया जाता है। अत: सयोग व अयोगकेवली असञी भी नहीं हैं।
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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