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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-२६९ नोट - सयोगकेवली के कपाटसमुद्घात की अपेक्षा औदारिकमिश्रकाययोग कहा गया है, क्यों कि उस समय उनके औदारिकमिश्रकाययोग पाया जाता है। अब क्रियिककाययोग में उदयादि का कथन करते हैं देवोधं वेगुब्वे, ण सुराणू पक्खिवेज णिरयाऊ । णिरयगदिहुंडसंढं, दुग्गदि दुब्भगचओ णीचं ।।३१४।। अर्थ - देवगति में उदययोग्य ७७ प्रकृतियों में से देवगत्यानुपूर्वी कम करके तथा नरकायु, नरकगति, हुण्डकसंस्थान, नपुंसकवेद, अप्रशस्तविहायोगति, दुर्भगचतुष्क और नीचगोत्र मिलाने पर वैक्रियककाययोग में उदययोग्य ८६ प्रकृतियाँ हैं। विशेषार्थ - वैक्रियककाययोग में उदययोग्य प्रकृति ८६ तथा गुणस्थान आदि के चार हैं। यहाँ मिथ्यात्वगुणस्थान में व्युच्छिन्न प्रतालि ५४ मिथ्यान्न, लदरम्पकानि ४४ अनुदर प्रकृति २, सम्यग्मिथ्यात्व और सम्यक्त्व | सासादनगुणस्थान में व्युच्छिन्नप्रकृति अनन्तानुबन्धी की चार कषाय, उदयप्रकृति ८३, अनुदयप्रकृति ३। मिश्रगुणस्थान में व्युच्छित्तिरूप प्रकृति १ सम्यग्मिथ्यात्व, उदयप्रकृति ८०, अनुदयप्रकृति ६। असंयतगुणस्थान में व्युच्छिन्नप्रकृति अप्रत्याख्यान की ४ कषाय, वैक्रियकशरीर, वैक्रियकअनोपाङ्ग, नरकगति-देवगति, नरकायु-देवायु, दुर्भग, अनादेय, अयशस्कीर्ति ये १३, उदयप्रकृति सम्यक्त्वसहित ८० तथा अनुदयप्रकृति ६ हैं। वैक्रियिककाययोग सम्बन्धी उदयव्युच्छित्ति-उदय-अनुदय की सन्दृष्टि उदययोग्यप्रकृति ८६,गुणस्थान ४ उदय उदय अनुदय गुणस्थान | व्युच्छित्ति मिथ्यात्व सासादन मिश्र विशेष | २ (सम्यग्मिथ्यात्व, सम्यक्त्व) १ (मिथ्यात्व) | ४ (अनन्तानुबन्धी) | ६ (४+३=७-१ सम्यग्मिध्यात्व) १ (सम्यग्मिथ्यात्व) ६ (६+१=७-१ सम्यक्त्व) .१३ (अप्रत्यारठ्यानकी ४ कषाय, वैक्रियकद्विक, नरकति, नरकायु, देवगति, देवायु, दुर्भग, अनाढय और अयशस्कीर्ति) असंयत
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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