________________
णमिऊण अभयदि सुदसायर पारगिंदणंदिगुरूं।
नरवीणदिणाई परडीणं पञ्चां वोच्छं ।।७४.५ ॥ कर्मकाण्ड ।। अर्थात् अभयनन्दीको, श्रुततागरके पारगामी इन्द्रनन्दी गुरुको और वीरनन्दीको नमस्कार कर प्रकृतियोंके प्रत्यय-कारणको कहूंगा।
वर इंदणंदिगुरुणो पासे सोऊण सयल सिद्धतं ।
सिरिकणयणंदिगुरुणा सत्तट्टाणं समुद्दिष्टं ॥३९६ ।। कर्मकाण्ड ।। अर्थात् उत्कृष्ट इन्द्रनन्दी गुरुके पास समस्त सिद्धान्तको सुनकर श्री कनकनन्दीगुरुने सत्त्वस्थान का कथन किया है।
इदि णेमिचंदमुणिणा अप्पसुदेणभयणदिवच्छेण ।
रइयो तिलोयसारो खमंतु बहुगुणायरिया ॥१०१८ ।। त्रिलोकसार ।। अर्थात् अभयनन्दीके वत्स नेमिचन्द्र मुनिने यह त्रिलोकसार ग्रन्थ रचा है, बहुतगुणोंके धारक | आचार्य क्षमा करें।
पीरिंदणंदिवच्छेणाप्पयसदेणभयणंदि सिस्लेण ।
दंसणचरित्तलद्धी सुसूयिया णेमिचंदेण ।।६५२ ।। क्षपणासार ॥ अर्थात् वीरनंदी और इन्द्रमन्दी के वत्स एवं अभयनन्दीके शिष्य अल्पज्ञानीके नेमिचन्द्रने दर्शनलब्धि और चारित्रलब्धिका कधन किया है।
श्री वीरसेनाचार्य विरचित धवला, जयधवला तथा महाधवला टीकाएँ प्रमेयबहुल टीकाएँ हैं। प्रत्येक प्रमेयका वर्णन उनमें विस्तृत रोतिसे किया गया है। धीरे-धीरे इन टीकाओंमें प्रवेश पाना अल्पमेधावी मानवोंको जब कठिन दिखने लगा तब नेनिचन्द्राचार्यने गंगवंशीय राजा राचमल्लके प्रधानमंत्री एवं सेनापति चामुण्डरायके आग्रहसे गोम्मटसार की रचना की। अपनी वीरताके कारण चामुण्डराय 'वीरमार्तण्ड' उपाधिसे विभूषित थे। श्रवणबेलगोलाके विध्यगिरि पर्वतपर जगत्प्रसिद्ध बाहुबली स्वामीकी ५७ फुट ऊँची प्रतिमा की प्रतिष्ठा इन्हीं चामुण्डरायने शकसम्वत् ९०० और विक्रमसम्बत् १०३५ में करवायी थी । चामुण्डराय का घरू नाम गोम्मट था। इसलिये उनके द्वारा प्रतिष्ठापित प्रतिमा गोम्मटस्वामी नामसे प्रसिद्ध हो गई। नेमिचन्द्राचार्य के द्वारा विरचित गोम्पटसार भी उन्हीं चामुण्डरायके नामसे प्रचलित हुआ है जिसका अर्थ होता है गोम्मटके लिए (चामुण्डरायके लिए) लिखा हुआ धवलादिनन्थोंका सार । इस संदर्भकी एक कथा प्रसिद्धि में है कि-"एकबार नेमिचन्द्राचार्य षट्-खण्डागमग्रन्थोंका स्वाध्याय कर रहे थे। उसी समय चामुण्डराय उनके दर्शनके लिये आये। चामुण्डराय के आनेपर नेमिचन्द्राचार्यने