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गोम्मटसार कर्मकाण्ड-२५१ सयोगीगुणस्थान में व्युच्छित्ति ३० प्रकृति की, उदय ४१ प्रकृति का और अनुदय ५५ प्रकृति का। अयोगीगुणस्थान में व्युच्छित्ति तीर्थकरबिना ११ प्रकृति की, उदय ११ प्रकृति का तथा अनुदय ८५ प्रकृतियों का है। .
मनुष्यनी के उदयव्युच्छित्ति-उदय-अनुदयसम्बन्धी सन्दृष्टि--
उदययोग्य प्रकृति ९६, गुणस्थान १४
उदयव्युच्छित्ति | उदय
अनुदय
गुणस्थान मिथ्यात्व सासादन मिश्र असंयत
देशसंयत प्रमत्तसंयत अप्रमत्तसंयत | ४ अपूर्वकरण । ६ अनिवृत्तिकरण ४ सूक्ष्मसाम्पराय १ उपशान्तमोह क्षीणमोह | १६ सयोगकेवली | ३० अयोगकेवली| ११
विशेष २ (सम्यग्मिथ्यात्व, सम्यक्त्व) १ (मिथ्यात्व) ५ (अनन्तानुबन्धी ४ + १ मनुष्यगत्यानुपूर्वी) ७ (३+५-१ सम्यग्मिथ्यात्व) अनु. ७ (७+१-१ सम्यक्त्वप्रकृति) व्यु. ७ (पूर्वोक्त अन्यत्याही ५ (पूर्वोक्त) ३ (स्त्यानगृद्धिआदि ३ निद्रा) ४ (अर्धनाराचादि तीन संहनन और सम्यक्त्व) ६ (हास्यादि नोकषाय) ४ (स्त्रीवेद और सज्वलनक्रोध-मान-माया) १ (सूक्ष्मलोभ) २ (वज्रनाराच व नाराचसंहनन)
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अब भोगभूमिज मनुष्य और तिर्यञ्चों में उदयादि का कथन दो गाथाओं में करते हैं।
मणुसोघं वा भोगे, दुब्भग चउणीचसंढीणतियं । दुग्गदितित्थमपुण्णं, संहदिसंठाणचरिमपणं ॥३०२॥ हारदुहीणा एवं, तिरये मणुदुच्चगोदमणुवाउं।
अवणिय पक्खिव णीचं, तिरियतिरियाउउज्जोवं ।।३०३॥जुम्मं ।। अर्थ - भोगभूमिज मनुष्यों में सामान्यमनुष्य के उदययोग्य १०२ प्रकृतियों में से दुर्भग आदि