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गुणस्थान
मिथ्यात्व
सासादन
मिश्र
असंयत
देशसंयत
गोम्मटसार कर्मकाण्ड - २४५
पञ्चेन्द्रियपर्याप्ततिर्यञ्चसम्बन्धी उदयव्युच्छित्ति- उदय-अनुदय की सन्दृष्टि उदययोग्यप्रकृति ९७, गुणस्थान ५
उदय
व्युच्छित्ति उदय
१
९५
४
८
८
९४
१०
११
८३
अनुदय
२
३
७
६
१४
विशेष
२ ( मिश्रप्रकृति व सम्यक्त्वप्रकृति) १ ( मिथ्यात्व )
४ (अनन्तानुबन्धीकषाय )
१ ( सम्यग्मिथ्यात्व ) ७ (७+१ तिर्यञ्च - गत्यानुपूर्वी - १ मिश्रमोहनीय)
६ (७ + १ २ सम्यक्त्व, तिर्यञ्चगत्यानुपूर्वी) ८ (४ अप्रत्याख्यानकषाय + दुर्भग, अनादेय; अयशस्कीर्ति और तिर्यञ्चगत्यानुपूर्वी) ८ (पूर्वोक्त)
अथानन्तर योनिनी और लब्ध्यपर्याप्ततिर्यञ्चों में उदयादि कहते हैं
पुसंदृणित्थिजुदा, जोणिणिये अविरदे ण तिरयाणू । पुण्णिदरे श्री श्रीणति, परघाददु पुण्णउज्जीवं ॥ २९६ ॥
सरगदिदु जसादेजं, आदीसंठाणसंहदीपणगं ।
सुभगं सम्मं मिस्सं, हीणा तेऽपुण्णसंढजुदा ॥ २९७॥जुम्मं ॥
अर्थ- पञ्चेन्द्रियपर्याप्ततिर्यञ्च के उदययोग्य ९७ प्रकृतियों में से पुरुषवेद व नपुंसकवेद कम करके स्त्रीवेद मिलाने से तिर्यंचयोनिनी के उदययोग्य प्रकृति ९६ हैं ( गुणस्थान पाँच हैं।) तिर्यंचयोनिनी सम्बन्धी उदययोग्य ९६ प्रकृतियों में से स्त्रीवेद, स्त्यानगृद्धिआदि तीन निद्रा, परघात, उच्छ्वास, पर्याप्त, उद्योत, सुस्वर, दुःस्वर, प्रशस्तविहायोगति, अप्रशस्तविहायोगति, यशस्कीर्ति, आदेय, आदि के पाँच संस्थान, आदि के पाँच संहनन, सुभग, सम्यक्त्व, सम्यग्मिथ्यात्व इन २७ प्रकृतियों को घटाकर तथा अपर्याप्त व नपुंसकवेद मिलाने से पञ्चेन्द्रिय लब्ध्यपर्याप्तकतिर्यञ्च के उदय योग्य प्रकृति ७१ हैं और एक मिथ्यात्वगुणस्थान है।
विशेषार्थ - तियंचयोनिनी के उदययोग्यप्रकृति ९६ तथा गुणस्थान ५ हैं। यहाँ मिथ्यात्वगुणस्थान में उदयव्युच्छित्ति मिथ्यात्वप्रकृति की, उदयप्रकृति १४, अनुदय सम्यग्मिथ्यात्व और सम्यक्त्वप्रकृति