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________________ ___ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-१७५ उत्कृष्टयोग से युक्त अन्यतर चारोंगति का सञी मिथ्यादृष्टिजीव तिर्यञ्चायु के उत्कृष्टप्रदेशबन्धका स्वामी है। सर्वपर्याप्तियों से पर्याप्त आठों कर्मों का बन्ध करने वाला और उत्कृष्टयोगसे युक्त अन्यतर चारोंगतिका सझी मिथ्यादृष्टिजीव तिर्यञ्चायुके उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध का स्वामी है। सर्व पर्याप्तियों से पर्याप्त आठों कर्मों का बन्ध करने वाला और उत्कृष्टयोग से युक्त अन्यतर चारगतिका सञी मिथ्यादृष्टि या सम्यग्दृष्टि देव व नारकी मनुष्यायु के उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध का स्वामी है। सभी पर्याप्तियों से पर्याप्त उत्कृष्टयोग से युक्त आठ प्रकार के कर्मों का बंध करने वाला और उत्कृष्ट योग से युक्त अन्यतर सञ्जीतिर्यञ्च व मनुष्य मिथ्यादृष्टि या सम्यग्दृष्टि देवायुके उत्कृष्टप्रदेशबन्धका स्वामी है। सभी पर्याप्तियों से पर्याप्त नामकर्म की नरकसम्बन्धी २८ प्रकृतियों के साथ सात मूलप्रकृतियों का बन्ध करने वाला उत्कृष्टयोग से युक्त सञ्जीपञ्चेन्द्रियतिर्यञ्च व मनुष्यमिथ्यादृष्टि नरकगति, नरकगत्यानुपूर्वी, अप्रशस्तविहायोगति और दुःस्वर के उत्कृष्टप्रदेशबन्ध का स्वामी है। सभी पर्याप्तियों से पर्याप्त नामकर्म की २३ प्रकृतियों के साथ सात मूल प्रकृतियों का बन्ध करने वाला उत्कृष्टयोग से युक्त अन्यत्तर संजीपञ्चेन्द्रिय मिथ्यादृष्टि तिर्यञ्च या मनुष्य तिर्यञ्चगति, एकेन्द्रियजाति, औदारिकशरीर, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, हुण्डकसंस्थान, वर्णचतुष्क, तिर्यञ्चगत्यानुपूर्वी, अगुरुलघु, उपघात, स्थावर, बादर, सूक्ष्म, अपर्याप्त, प्रत्येक, साधारण, अस्थिर, अशुभ, दुर्भग, अनादेय, अयशस्कीर्ति और निर्माण इन नामकर्म की २५ प्रकृतियों के उत्कृष्टप्रदेशबन्ध का स्वामी है। सर्व पर्याप्तियों से पर्याप्त नामकर्म की २५ प्रकृतियों के साथ सात मूलप्रकृतियों का बन्ध करने वाला और उत्कृष्टयोग से युक्त अन्यतर सजीपञ्चेन्द्रिय मिथ्यादृष्टि तिर्यञ्च या मनुष्य नामकर्म की मनुष्यगति, ४ जाति, औदारिकशरीरअङ्गोपाङ्ग, असम्प्राप्तासृपाटिकासंहनन. मनुष्यगत्यानुपूर्वी और त्रस इन नौ प्रकृतियों के उत्कृष्टप्रदेशबन्धका स्वामी है। सभी पर्याप्तियों से पर्याप्त देवगतिसम्बन्धी नामकर्म की २८ प्रकृतियों के साथ सात मूलप्रकृतियों का बन्ध करने वाला और उत्कृष्टयोग से युक्त अन्यतर सञ्जीपञ्चेन्द्रिय तिर्यंच व मनुष्य मिथ्यादृष्टि या सम्यदृष्टि देवगति, वैक्रियिकशरीर, समचतुरस्रसंस्थान, वैक्रियिकशरीरअङ्गोपाङ्ग, देवगत्यानुपूर्वी, प्रशस्तविहायोगति, सुभग, सुस्वर और आदेय इन नामकर्म की ९ प्रकृतियों के उत्कृष्ट प्रदेशबन्धका स्वामी है। नामकर्म की ३० प्रकृतियोंके साथ सात मूलप्रकृतियों का बन्ध करनेवाला और उत्कृष्टयोग से युक्त अन्यतर अप्रमत्तसंयत आहारकशरीर व आहरकशरीरअङ्गोपाङ्गके उत्कृष्टप्रदेशबन्ध का स्वामी है। सर्व पर्याप्तियों से पर्याप्त नामकर्म की २९ प्रकृत्तियों के साथ सात मूलप्रकृतियों का बन्ध करनेवाला और उत्कृष्टयोग सहित चारों गति का सञ्जीपञ्चेन्द्रिय मिथ्यादृष्टिजीव चारसंस्थान और चारसंहनन के उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध का स्वामी है यही जीव वज्रर्षभनारायसंहनन के उत्कृष्टप्रदेशबन्धका स्वामी है, किन्तु मिथ्यादृष्टिके स्थान पर सम्यग्दृष्टि या मिथ्यादृष्टि कहना चाहिए। सर्वपर्याप्तियों से पर्याप्त नामकर्मकी २५ प्रकृतियों के साथ सात मूलप्रकृतियों का बन्ध करने वाला और उत्कृष्ट योग से युक्त सज्ञीपञ्चेन्द्रिय मिथ्यादृष्टि तिर्यञ्च या मनुष्य अथवा देवनामकर्म की परघात, उच्छ्वास, पर्याप्त, स्थिर और शुभ इन पाँच प्रकृतियों के उत्कृष्ट प्रदेशबन्धका स्वामी है। आतप और उद्योतप्रकृतिके उत्कृष्टप्रदेशबन्ध
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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