SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 211
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-१७३ अर्थ - आयुकर्म का उत्कृष्टप्रदेशबन्ध तृतीयगुणस्थान को छोड़कर प्रथमगुणस्थान से सप्तमगुणस्थान तक छहगुणस्थानवर्ती जीव करते हैं। मोहनीयकर्म का उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध नवम गुणस्थानवर्तीजीव करता है। शेष ज्ञानावरण-दर्शनावरण-वेदनीय-नाम-गोत्र और अन्तरायका उत्कृष्टप्रदेशबन्ध उत्कृष्टयोगों का धारी सूक्ष्मसाम्परायगुणस्थानवर्तीजीव करता है। इन तीनों स्थानों में उत्कृष्टयोगद्वारा अल्पप्रकृतिबन्धकजीव उपर्युक्त मूल प्रकृतियों का उत्कृष्टप्रदेशबन्ध करता है। विशेषार्थ - उत्कृष्टयोग के साथ ज्ञानावरण, दर्शनावरण, अन्तराय, नाम, गोत्र और वेदनीय इन छह कर्मोका बन्ध करनेवाला अन्यतर सूक्ष्मसाम्परायगुणस्थानवर्ती उपशामक या क्षपक ज्ञानावरणादि छहोंकर्मों का उत्कृष्टप्रदेशबन्धक है। उत्कृष्टयोग के साथ सात प्रकार के कर्मों का बन्ध करनेवाला सभी पर्याप्तियों से पर्याप्त चारोंगति का पञ्चेन्द्रियसझी, मिथ्यादृष्टि या सम्यग्दृष्टिजीव मोहनीयकर्म का उत्कृष्टप्रदेशबन्ध करता है तथा उत्कृष्टयोग के साथ आठ कर्मोंका बन्ध करनेवाला सभी पर्याप्तियों से पर्याप्त चारों गति का पञ्चेन्द्रियसझी, मिथ्यादृष्टि या सम्यग्दृष्टिजीव आयुकर्मका उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करता है। सम्यग्मिथ्यात्व (मिश्र) गुणस्थान में आयुकर्म का बन्ध नहीं होता और अप्रमत्तगुणस्थान में आयुकर्म की बन्धव्युच्छित्ति हो जाती है, अतः आयुकर्मका उत्कृष्टप्रदेशबन्ध मिथ्यात्व, सासादन, असंयत, देशसंयत, प्रमत्त व अप्रमत्त इन ६ गुणस्थानों में ही सम्भव है। आगे उत्तरप्रकृतियों में उत्कृष्टप्रदेश का स्वामित्व तीनगाथाओं में कहते हैं - सत्तर सुहुमसरागे, पंचऽणियहिम्हि देसगे तिदियं । अयदे विदियकसायं, होदि हु उक्तस्सदव्वं तु ॥२१२॥ छण्णोकसायणिद्दापयलातित्थं च सम्मगो य जदी। सम्मो वामो तेरं, णरसुरआऊ असादं तु ॥२१३॥ देवचउक्कं वज्जं, समचउरं सत्थगमणसुभगतियं । आहारमप्पमत्तो, सेसपदेसुक्कडो मिच्छो॥२१४॥ विसेसयं । अर्थ - ज्ञानावरण ५, दर्शनावरण ४, अन्तराय ५, यश:कीर्ति, उच्चगोत्र और साप्तावेदनीय इन १७ प्रकृतियों का उत्कृष्टप्रदेशबन्ध सूक्ष्मसाम्परायगुणस्थान में होता है। अनिवृत्तिकरणगुणस्थान में पुरुषवेद और चारसञ्चलनकषाय, इन ५ प्रकृतियों का उत्कृष्टप्रदेशबन्ध है, देशविरतगुणस्थान में प्रत्याख्यानकी चारकषाय, असंयतगुणस्थानवर्ती जीव अप्रत्याख्यानकी चार कषाय और हास्यादि ६ १. महाबन्ध पु.६ पृ. १४-२४|
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy