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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-१६० अन्तप्रकृतिपर्यन्त अपना-अपना सर्वघातिद्रव्य घटता-घटता देना एवं नाम और अन्तरायकर्म की प्रकृतियों में द्रव्य बढ़ता-बढ़ता अथवा अन्तिम से आदि प्रकृति पर्यन्त घटता-घटता देना। विशेषार्थ - ज्ञानावरणीयकर्म का सर्वद्रव्य जो पहले कहा था उसमें यथायोग्य अनन्तका भाग देना, इसमें एकभाग प्रमाण सर्वघातिद्रव्य है। इस सर्वधातिद्रव्य का विभाग इस प्रकार करना है - ___ आवलि के असँख्यातवेंभाग का भाग देकर एक भाग के बिना शेष बहुभाग के समानरूप से पाँचभाग करना और प्रत्येक प्रकृतिको देना। जो एक भाग शेष रहा उसमें प्रतिभाग (आवलि के असंख्यातवें भाग) का भाग देकर जो लब्ध आवे उसमें से बहुभाग मतिज्ञानावरण को देना तथा जो एक भाग शेष रहा उसमें उसी प्रतिभाग का भागदेकर बहुभाग श्रुतज्ञानावरणको एवं जो एकभाग शेष रहा उसमें उसी प्रतिभाग का भाग देकर बहुभाग अवधिज्ञानावरणको देना तथा जो अवशेष एक भाग बचा उसमें उसी प्रतिभाग का भाग देकर बहुभाग मन:पर्ययज्ञानावरण को देना एवं जो एक भाग शेष रहा वह केवलज्ञानावरण का द्रव्य जानना । इस प्रकार पहले जो समानभाग कहे थे उनमें बाद में जो-जो प्रमाण बतलाए हैं उन्हें क्रम से मिलाने पर मतिज्ञानावरणादिका सर्वघातिद्रव्य होता है एवं ज्ञानावरणसम्बन्धी द्रव्य के अनन्तभागों में से एकभाग बिना शेष बहुभाग देशघाति द्रव्य है, इसमें पूर्वोक्त क्रम से उसी (आवलिके असंख्यातवेंभाग मात्र) प्रतिभाग का भाग देकर एकभागबिना बहुभाग के चार समान भाग करके एक-एक भाग मतिज्ञानावरणादि चार प्रकृतियों को देना तथा शेष रहे एक भाग में प्रतिभागका भाग देने पर जो लब्ध आवे उसमें से बहुभाग मतिज्ञानावरण को देना तथा जो शेष एक भाग रहा उसमें प्रतिभाग का भाग देकर बहुभाग श्रुतज्ञानावरण को देना एवं शेष बचे एकभाग में प्रतिभाग का भाग देकर बहुभाग अवधिज्ञानावरण को देना और जो एक भाग शेष रहा वह मनःपर्ययज्ञानावरण को देना। इस प्रकार इन प्रत्येकभागों को, पूर्व में जो समानरूप से चार भाग किए थे, उनमें क्रम से मिलाने पर मतिज्ञानावरणादिके देशधातिद्रव्य का प्रमाण होता है तथा अपना-अपना देशघाति और सर्वघातिद्रव्य मिलाने पर ज्ञानावरण की उत्तर प्रकृतियों के सर्वद्रव्य का प्रमाण होता है। यहाँ इतना अवश्य जानना कि प्रकृतियों के द्रव्यसम्बन्धी विभाग में सभी स्थानों पर जहाँ प्रतिभाग का भाग देना कहा है वहाँ आवलिके असंख्यातवेंभाग का भाग जानना । तथैव दर्शनावरणीयकर्म के पूर्वोक्त सर्वद्रव्यके प्रमाण में अनन्तका भाग देना, उसमें जो एकभागप्रमाण सर्वघातिद्रव्य है उसमें प्रतिभाग का भाग देने से जो लब्ध आवे उसमें से एकभाग के बिना बहुभाग के ९ विभाग करके एक-एक समानभाग दर्शनावरण की ९ उत्तरप्रकृतियों को देकर जो एकभाग शेष रहा था उसमें प्रतिभाग का भाग देकर बहुभाग स्त्यानगृद्धिप्रकृति को देना तथा शेष रहे एक भाग में प्रतिभागका भाग देकर एक भाग बिना बहुभाग निद्रानिद्रा को देना। इसी क्रमानुसार ज्ञानावरण के उत्तरभेदों के समान प्रतिभागका भाग दे-देकर बहुभाग-बहुभाग प्रमाणद्रव्य क्रमसे प्रचला-प्रचला, निद्रा
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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