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गोम्मटसार कर्मकाण्ड ७२
अथ इन्द्रियमार्गणा
आगे इन्द्रियमार्गणासम्बन्धी बन्ध-अबन्ध और बन्धव्युच्छित्ति का कथन करते हैं - पुण्णिदरं विगिविगले तत्थुप्पण्णो हु सासणी देहे । पज्जत्तिं णवि पावदि इदि णरतिरियागं णत्थि ॥ ११३ ॥
अर्थ - एकेन्द्रिय तथा विकलत्रय में लब्ध्यपर्याप्तकवत् बन्धयोग्यप्रकृति १०९ हैं । यहाँ गुणस्थान मिथ्यात्व - सासादन ये दो ही हैं। एकेन्द्रिय तथा विकलत्रय में उत्पन्न हुआ जीव सासादनगुणस्थान में पर्याप्तियोंको पूर्ण नहीं कर सकता अतः यहाँ तिर्यञ्च व मनुष्यायुका भी बन्ध नहीं करता, इसलिए इन दोनों की बन्धव्युच्छित्ति प्रथमगुणस्थान में होती है।
विशेषार्थ - इन्द्रियमार्गणा में एकेन्द्रिय तथा विकलत्रय में लब्ध्यपर्याप्तकके समान तीर्थकर, आहारकद्विक, देवायु- नरकायु और वैक्रियिकषटकू इन ११ प्रकृतियों का बन्धनहीं है अतः बन्धयोग्य प्रकृति १०९ हैं । गुणस्थान दो हैं । प्रथमगुणस्थान में सामान्य से जिन १६ प्रकृतियों की व्युच्छित्ति होती है उनमें से नरकद्विक और नरकायु ये तीन कम करके मनुष्य तिर्यञ्चायु मिलाने से यहाँ मिथ्यात्वगुणस्थान में १५ प्रकृतियाँ व्युच्छिन्न होती हैं क्योंकि सासादनगुणस्थानका काल अल्प और निर्वृत्यपर्याप्तका काल अधिक होने से सासादनगुणस्थान में शरीरपर्याप्ति पूर्ण नहीं होती अतः मनुष्य व तिर्यञ्चायुका बन्ध नहीं होता है। मिध्यात्वगुणस्थान में बन्ध १०९ प्रकृतिका एवं अबन्धप्रकृति शून्य है। सासादनगुणस्थान में व्युच्छित्ति पूर्वोक्त २९ प्रकृतिकी, बन्धरूपप्रकृति ९४ और अबन्धप्रकृति १५ हैं ।
एकेन्द्रिय और विकलत्रय जीवों में बन्ध- अबन्ध - बन्धव्युच्छित्ति की सन्दृष्टि
बन्धयोग्य प्रकृति १०९ । गुणस्थान २ ।
गुणस्थान बन्ध अबन्ध व्युच्छित्ति मिथ्यात्व १०९ ०
१५
सासादन
९४
२९
विशेष
१५ ( गुणस्थानोक्त १६- ३ नरकद्विक, नरकायु + २ मनुष्यायु, तिर्यञ्चायु)
२९ ( तिर्यञ्चगति में कथित ३१-२ तिर्यञ्च, मनुष्यायु)
"पंचिदिए ओघं" गाथा ११४ के इन वचनों के अनुसार पञ्चेन्द्रियजीव-सम्बन्धी बन्धअबन्धादिका कथन गुणस्थान के समान जानना चाहिए, इसमें कुछ भी विशेषता नहीं है । यहाँ बन्धयोग्य १२० प्रकृति तथा गुणस्थान १४ जानना । संक्षेप से कथन इस प्रकार है -