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गुणस्थान
मिथ्यात्व
सासादन
मिश्र
असंयत
गोम्मटसार कर्मकाण्ड - ६८
सौधर्म - ईशानस्वर्ग में बन्ध- अबन्ध - व्युच्छित्ति की संदृष्टि
बन्धयोग्य प्रकृति १०४ । गुणस्थान चार ।
बन्ध अबन्ध व्युच्छित्ति
१०३
९६
१
८
३४
७२ ३२
७०
6.
२५
०
१०
विशेष
१ ( तीर्थकर ) ७ ( मिथ्यात्वादि पूर्वोक्त)
३४ (२५+८+१ मनुष्यायु)
३२ (३४ - २ तीर्थकर व मनुष्यायु)
कपित्थी ण तिथं सदरसहस्सारगोत्ति तिरियदुगं । तिरियाऊ उज्जोवो अत्थि तदो णत्थि सदरचउ ।। ११२ ।।
अर्थ - कल्पवासिनी देवानाओं में तीर्थङ्करप्रकृति का बन्ध नहीं होता है । तिर्यञ्चगतितिर्यञ्चगत्यानुपूर्वी - तिर्यञ्चायु और उद्योत, इन चार प्रकृतियों का बन्ध ग्यारहवें - बारहवें ( सतार - सहसार) स्वर्गपर्यन्त होता है। इन चारप्रकृतियों को 'शतार चतुष्क' भी कहते हैं, क्योंकि शतारयुगल तक ही इनका बन्ध होता है। उससे आगे आनतादि स्वर्गों में इनका बन्ध नहीं होता ।
विशेषार्थ - कल्पवासिनी देवाजनाओं में बन्ध- अबन्धादि का कथन भवनत्रिकवत् जानना इसका समस्त वर्णन भवनत्रिक के साथ पूर्वगाथा में कर आये हैं।
सनत्कुमारादि दस स्वर्गों में नरकगति के समान ही रचना है । यहाँ बन्ध योग्य प्रकृति १०१ तथा गुणस्थान चार हैं क्योंकि इन स्वर्गों में एकेन्द्रिय, स्थावर और आतपप्रकृति का बंध नहीं होता है। (१०४-३= १०१ ) | ईशानस्वर्गपर्यन्त मिथ्यात्वगुणस्थान में जिन सात प्रकृतियों की व्युच्छित्ति होती है। उनमें से यहाँ मिथ्यात्वगुणस्थान में मिथ्यात्व, हुण्डकसंस्थान, नपुंसकवेद तथा सृपाटिकासंहनन की ही व्युच्छित्ति होती है, बन्धयोग्य प्रकृति तीर्थकर बिना १००, अबन्ध तीर्थङ्करप्रकृतिका । सासादनगुणस्थान
व्युच्छिन्न प्रकृति २५, बन्धप्रकृति ९६, अबन्धप्रकृति ५ । मिश्रगुणस्थान में व्युच्छित्ति शून्य, बन्धप्रकृति ७० मनुष्यायु के बिना; अबन्ध ३१ । असंयतगुणस्थान में व्युच्छित्ति १०, बन्धप्रकृति मनुष्यायु-तीर्थङ्कर: सहित ७२, अबन्ध २९ प्रकृति का है।