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________________ ५६/मो. सा. जीवकाण्ड गाथा ५० पुनरुक्त प्रथमस्थान और अन्तिम समय के अन्य दो स्थान पुनरुक्त अन्तिम स्थान और प्रथम समय के अन्य दो स्थान अधःप्रवृत्तकरण में प्रथम समय का प्रथमखण्ड और अन्तिम समय का अन्तिमखण्ड अपुनरुक्त है तथा शेष सभी खण्ड पुनरुक्त है। | ४० ४१ ४२ इस प्रकार अधःप्रवृत्तकरण का कथन पूर्ण हुअा। अब अपूर्वकरण का कथन करते हैं मपूर्वकरण गुणस्थान अंतोमुत्तकालं गमिकरण अधापयत्तकरणं तं । पडिसमयं सुज्झतो अपुष्धकरणं समल्लियइ ॥५०॥ ___ गाथार्थ---अन्तर्मुहूर्तकाल के द्वारा अधःप्रवृत्तकरण को व्यतीतकर प्रतिसमय विशुद्ध होता हुआ अपूर्व.रण का प्राध्य करता है ॥५०॥ विशेषार्थ–सातिशय-अप्रमत्त अपने योग्य अन्तर्मुहूर्त काल तक प्रतिसमय अनन्तगुणी विशुद्धि के द्वारा बढ़ता हा उन विशुद्ध परिणामों से सातादि प्रशस्त प्रकृतियों के चतु:स्थानीय अनुभाग का
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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