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________________ गाया ६४६-६४८ सम्यक्त्वमार्गणा / ७०७ स्थितिसत्व श्रसंज्ञी-पंचेन्द्रिय के स्थितिबन्ध के समान हो जाता है। इसके पश्चात् सहस्रों स्थितिrushi के तीत होने पर अनन्तानुबन्धी चतुष्क का स्थितिसत्त्व चतुरिन्द्रिय के स्थितिबन्ध के समान हो जाता है । इस प्रकार क्रमणः त्रीन्द्रिय, द्वीन्द्रिय और एकेन्द्रिय जीवों के स्थितिबन्ध के समान होकर पत्योपप्रमाण स्थितिसत्त्व हो जाता है। तब प्रनन्तानुबन्धी चतुष्क के स्थितिकाण्डक का प्रमाण स्थितिसत्त्व के संख्यात बहुभाग होता है और शेष कर्मों का स्थितिकांडक पल्योपम के संख्यातवें भाग ही है। इस प्रकार सहस्रों स्थिति कांडकों के व्यतीत होने पर दुरापकृष्ट संज्ञात्राले स्थितिसत्त्व के अवशेष रहने पर वहाँ से शेष स्थितिसत्त्व के असंख्यात भागों का घात करता है।' शंका- दुरापकृष्ट किसे कहते हैं ? समाधान - पत्योपम को उत्कृष्ट संख्यात से भाग देने पर जो लब्ध प्राप्त हो, उसमें से एक-एक तब तक कम करते जायें जब तक पल्योपम को जघन्य परीतासंख्यात से भाजित करने पर जो लब्ध आवे तत्प्रमाण प्राप्त न हो। इस प्रकार स्थिति के जितने विकल्प हैं वे सब दूरापकृष्ट हैं | जिस अवशिष्ट सत्कर्म में से संख्यात बहुभाग को ग्रहण कर स्थितिकाण्डक का वात करने पर शेष बच्चा स्थिति सत्कर्म नियम से पत्योपन के असंख्यातवें भागप्रमाण होकर अवशिष्ट रहता है, उस सबसे अन्तिम योपम के संख्यातव भाग प्रमाण स्थिति सत्कर्म की दुरापकृष्ट संज्ञा है । तत्पश्चात् पयोम के श्रसंख्यातवें भाग आयाम वाले अन्तिम स्थितिकांड को अन्तर्मुहूर्त मात्र उत्कीरण काल के द्वारा छेदन होने के पश्चात् ग्रनिवृतिकरण के अन्तिम समय में उदपावली से बाह्य सर्व स्थितिसत्व को परस्वरूप से संक्रमित कर अन्तर्मुहूर्त काल के व्यतीत होने पर मोहनी की क्षपणा का प्रारम्भ करता है ।" दर्शन मोहनीय कर्म के क्षपण करने वाले परिणाम भी अधःप्रवृत्तकरण अपूर्वकरण और अनि वृत्तिकरण के भेद से तीन प्रकार के होते हैं । इनका कथन जिस प्रकार ऊपर अनन्तानुबन्धी की विसंयोजना में किया गया है उसी प्रकार यहाँ पर भी करना चाहिए [विशेष के लिए धवल पु. ६ पू. २५४ से पृ. २६३ देखने चाहिए अथवा जयधवल पु. १३ में पृ. १४ से ६४ देखने चाहिए] अन्तिम स्थितिross के समाप्त होने पर कृतकृत्यवेदक हो जाता है । कृतकृत्य वेदक काल के भीतर उसका मरण भी हो, संक्लेश को प्राप्त हो अथवा विशुद्धि को प्राप्त हो तो भी प्रसंख्यातगुरिणत श्रेणी के द्वारा जब तक एक समय अधिक प्रबलो काल शेष रहता है तब तक श्रसंख्यात समयप्रत्रद्धों की उदीररणा होती रहती है ।" जिसने दर्शनमोहनीय कर्म का क्षय कर दिया है उसका संसार में प्रवस्थान मद्यपि बहुत है तथापि उसके प्रस्थापकभव को छोड़कर अन्य तीन भवों से अधिक नहीं होते। कहा भी हैबणाए पटुबगो जम्हि भये शियमसा तदो अण्णे । गाथिच्छदि तिथि भवे दंसरणमोहम्मि खोलम्मि ।। ११३ ।। * १. धवल पु. ६ पृ. २५१ । २. "का दूरापकृष्टनमिति ? उत्कृष्टसख्यातेन भक्त यल्लब्धं तस्मादेककहान्या जनमताख्यान भक्त पत्ये यमब्धं तस्मादेकोत्तरवृत्रया यावन्ती विकल्पास्तावन्तो दूरापकृष्टभेदा: " १२० टीका ] | ३. जयनवल पु. १३ पृ. ४५ ४, धवला पू. ६ पृ. २५२ । ५. धवल पु. ६ पृ. २६३ । ६. जयधवल पु. १३ पृ. १ । [
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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