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________________ गाथा ५६४-५६५ सम्यक्त्वमागंगा/६६३ शंका-ये सब वर्गणायें एक क्यों हैं ? समाधान -श्योंकि ये सब वर्गणायें अनन्तरूप से एक हैं । ये चारों ही बर्गगणायें अग्राह्य हैं।' अनन्तानन्तप्रदेशी परमाण पुदगल द्रव्य वर्गणा जो उत्कृष्ट है, उसमें एक अंक मिलाने पर जाय आहार द्रश्य हो । फिर एक अधिक के क्रम से अभव्यों से अनन्तगुणे और सिद्धों के अनन्त भाग प्रमाण भेदों के जाने पर अन्तिम आहार द्रव्यवर्गणा होती है । यह जघन्य से उत्कृष्ट विशेष अधिक है। विशेष का प्रमाण अभन्यों से अनन्तगुणा अर्थात सिद्धों के अनन्तवें भाग प्रमाण होता हुया भी, उत्कृष्ट ग्राहार द्रव्यवर्गणा के अनन्तवें भाग प्रमाण है । औदारिक, वैऋियिक और आहारक शरीर के योग्य गुद्गलस्कन्धों की आहार द्रव्यबर्गणा संज्ञा है । आहार वर्गणा के असंख्यात खण्ड करने पर बहुभाग प्रमाण याहारक शरीर प्रायोग्य वर्गणाग्र होता है। शेष के असंख्यात खंद करने पर बहुभाग प्रमाण वैऋियिक शरीर प्रायोग्य वर्गसंगाग्र होता है । तथा शेष एक भाग ग्रौदारिक शरीर प्रायोग्य वर्गणाग्र होता है । | धवल पु. १४ पृ. ५६० | यह पाँचबी वर्गगा है।५।। उत्कृष्ट याहार द्रव्यवगा में एक अंक के मिलाने पर प्रथम अग्रहरा द्रप्रवर्गणा सम्बन्धी सर्व-जधन्य वर्गणा होती है। फिर एक-एक बढ़ाते हुए अभव्यों से अनन्त गुणे और सिद्धों के अनन्तवें भाग प्रमाण स्थान जाकर उत्कृष्ट अग्रहरण द्रव्यवर्गणा होती है। यह जघन्य से उत्कृष्ट अनन्तगुणी होती है । अभदयों से अनन्त गुणा अर्थात् सिद्धों के अनन्तवें भाग प्रमाण गुणकार है। इस प्रकार यह छटो वर्गणा है ।६। पाँच शगेर नथा भाषा और मन के अयोग्य जो 'पद्गल स्कन्ध हैं, उनकी अग्रहण वर्गगणा संज्ञा है। उत्ष्ट अग्रहण द्रव्यवर्गणा में एक अंक मिलाने पर सबसे जघन्य तैजस शरीर द्रव्यवर्गरणा होती है । पुनः एक-एक अधिक के क्रम से अभव्यों से अनन्तगुगणे और सिद्धों के अनन्तवें भाग प्रमारण स्थान जाकर उत्कृष्ट तंजस-शरीर-द्रव्य-वर्गणा होती है। यह अपने जघन्य से उत्कृष्ट विशेष अधिक है । अभव्यों से अनन्त गुणा और सिद्धों के अनन्सवें भाग प्रमाण विशेष का प्रमाण है इसके गुद्गल स्कन्ध नंजस शरीर के योग्य होते हैं, इसलिए यह ग्रहण वर्गणा है । यह सातवीं वर्गणा है ।७।३ उत्कृष्ट तैजस शरीर द्रव्यवर्गणा में एक अंक मिलाने पर दूसरी अग्रहण द्रव्यवर्गणा मम्बन्धी पहली सर्व जघन्य अग्रहण द्रध्यवर्गणा होती है। फिर आगे एक-एक अधिक के क्रम से अभव्यों से अनन्तगुणे और सिद्धों के अनन्त भाग प्रमाण स्थान जाकर दूसरी प्रग्रहण-द्रव्य-बर्गणा सम्बन्धी उत्कृष्ट बर्गगार होती है । वह अपनी जघन्य बर्गणा से अपनी उत्कृष्ट वर्गणा अनन्तगुणी है। यह पाँच शरीर, भाषा और मन के ग्रहण योग्य नहीं है. इसलिए इसकी अग्रहरण द्रव्यबर्गरणा संज्ञा है । यह आठवीं वर्गणा है ।। दूसरी उत्वष्ट अग्रहण द्रव्यन्वनरणा में एक ग्रंक के प्रक्षिप्त करने पर सबसे जघन्य भाषा द्रव्यवर्गणा होती है । इससे आगे एक-एका अधिवः के क्रमसे अभव्यों से अनन्तगुणे और सिद्धों के १. धवल पु. १४ पृ. ५०-५६ । २. घबल पृ. १४ पृ. ५६ । ३. धवल पु. १४ पृ. ६० ।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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