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गाथा ५५७-५५८
भव्यमार्गणा/६२१
णवि इविय-उयसग्गा वि मोहो विहियो रण लिहाय । गय तिण्हा रोब छ हा तत्थेव य होइ रिणवाणं ॥१७६।।[नियमसार]
–जहाँ न दुःख है. न सोसारिक सुख है, न पीड़ा है, न बाधा है, न मरण है, न जन्म है, न इन्द्रियाँ हैं, न उपसर्ग हैं, न मोह है, न विस्मय है, न निद्रा है. न तृषा है और न क्षुधा है, वही निर्वाणमुख है अथवा लेण्या रहित जीवों का सुख है।
इस प्रकार गोमटमार जीवकाण्ड में लेश्या मार्गणा जाम का पन्द्रहवाँ अधिकार पूर्ण दया ।
१६. भव्यमार्गणाधिकार भविया सिद्धी जेसि जीवारणं ते हवंति भवसिद्धा । तविवरीयाऽभव्या संसाराशे रण सिझंति ।।५५७॥' भठवतरणस्स जोग्गा जे जीवा ते हवंति भवसिद्धा।
प हु मलविगमे रिणयमा ताणं करणगोवलारणमिव ॥५५८॥ गाथार्थ-जिन जीवों की सिद्धि होने वाली हो अथवा जो जीव सिद्धत्व अवस्था पाने के योग्य हों वे भव्य-सिद्ध हैं, किन्तु उनके कनकोएल (स्वर्णपाषाण) के समान मल-नाश होने का नियम नहीं है । भव्य-सिद्ध से विपरीत प्रभव्यसिद्ध हैं जो संसार से कभी नहीं निकलते ।। ५.५७-५५८ ।।
विशेषार्थ-जिसने निर्वाण को पुरस्कृत किया है वह भव्य है । जो आगे सिद्धि को प्राप्त होंगे वे भव्य सिद्ध जीव हैं।
शङ्का-इस प्रकार तो भव्य जीवों की सन्तनि का उच्छेद हो जाएगा?
समाधान-नहीं,क्योंकि भव्य जीव अनन्त हैं। परन्तु जो राशि सान्त होती है उसमें अनन्तपना नहीं बन सकता है, क्योंकि सान्त को अनन्त मानने में विरोध पाता है।
शङ्का जिस राशि का निरन्तर व्यय चालू है. परन्तु उसमें माय नहीं होती है तो उसके अनन्तपना कैसे बन सकता है ?
समाधान-- नहीं, क्योंकि यदि सव्यय और निराय-पायरहित राशि को भी अनन्त न माना जाय तो एक को भी ग्रनन्त मानने का प्रसंग या जाएगा । व्यय होते हुए भी अनन्त का क्षय नहीं होता है। दूसरे, व्यय सहित अनन्त के सर्वथा क्षय मान लेने पर काल का भी मर्वथा क्षय हो जाएगा क्योंकि व्यय सहित होने के प्रति दोनों समान हैं।
१. घबल पु. १ पृ. ३९४ प्रा. प. सं. प्र. १ मा. १५६। २. धवल पु. १ पृ. १५०, पृ. ४५. ४७८; . पं. सं. प्र. १ गा. १५४ । ३. "निरिणपुरस्कृतो भव्यः ।" [ध बल पु. १ पृ. १५०] । ४. "भव्या भविष्यतीति सिद्धिपा ते भब्य सिद्धयः ।" [धवल पु. १ पृ. ३९२] ।