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________________ गाथा ५३६ लेण्यामागरणा/५६६ समाधान-तीव्रतम, तीव्रतर और तीन कषाय के उदय का सद्भाव चौथे गुणस्थान तक ही पाया जाता है, इसलिए चौथे गुरणस्थान तक ही तोन अशुभ लेश्याएँ होती हैं ।' शङ्का-जिन जीवों की कगाय क्षीण (नष्ट) अथवा उपशान्त हो गई है उनके शुक्ल लेश्या का होना कसे गम्भत्र है ? समाधान - नहीं, क्योंकि जीवों की कपाय क्षीरा अथवा उपशान्त हो गई है उनमें कर्मलेप का कारण योग पाया जाता है, इसलिए इस अपेक्षा से उनके शुक्ल लेश्या मान लेने में कोई विरोध नहीं पाता है। अकषाय वीतरागियों के केबल योग को लेश्या नहीं कह सकते, ऐसा निश्चय नहीं कर लेना चाहिए, क्योंकि लेश्या में योग की प्रधानता है, कषाय प्रधान नहीं है ; क्योंकि वह योग प्रवृत्ति का विशेषण है। श्रतएव उसकी प्रधानता नहीं हो सकती। सचमुच क्षीणकषाय जीवों में लेश्या के अभाव का प्रसंग पाता, यदि केबल कषायोदय से ही लेश्या की उत्पत्ति मानी जाती। किन्त शरीर नामकर्म के उदय से उत्पन्न योग भो तो लेश्या माना गया है, क्योंकि यह भी कर्मबन्ध में निमित्त होता है । इस कारण कषायों के नष्ट हो जाने पर भी योग रहता है, इसलिए क्षीणवाषाय जीवों के लेश्या मानने में कोई विरोध नहीं आता। सौधर्मशान देवों के मध्यम पीत लेश्या होती है । सानत्कुमार माहेन्द्र देवों के प्रकृष्ट पीत लेश्या और जघन्य पद्म लेश्या होती है । ब्रह्म ब्रह्मोत्तर, लान्तव कापिष्ट स्वर्गों में मध्यम पद्म लेश्या होती है । शुक्र महाशुक्र-शतार-सहस्रार स्वर्ग के देवों में प्रकृष्ट पद्यलेश्या और जघन्य शुक्ल लेश्या होती है । आनत आदि (आनत प्राणत, आरण, अच्युत स्वर्ग तथा नव अवेयक) में मध्यम शुक्ल लेश्या जाननी चाहिए। नवानुदिश तथा पंचानुत्तर विमानों में परम शुक्ल लेश्या होती है । इस प्रकार किस जीव में कौनसी लेश्या होती है अथवा किस लेश्या का कौन-कौन स्वामी है, यह कथन कर के एक गाथा द्वारा साधन का कथन किया जाता है - वण्णोदयसंपादितसरीरवणो दु वदो लेस्सा । मोहचय-खग्रोवसमोयसमखजजीवफदरणं भावो ॥५३६॥ गाथार्थ-वर्ण नाम कर्मोदय से जो शरीर का वर्ण (रंग) होता है बह द्रव्य लेण्या है । मोहनीय कर्म के उदय, क्षयोपशम, उपशम या क्षय सहित जो जीवप्रदेशों की चत्रलला अथवा परिस्पन्द अथवा संकोच-विकोच है (योग है) वह भावलेश्या है ।।५३६।। विशेषार्थ-- नाम कर्म (वर्ग नाम कर्म) के उदय के निमित्त से द्रव्य लेश्या होती है । कषाय के उदय, क्षयोपशम, उपशम और क्षय होने पर प्रात्म-प्रदेश-परिस्पन्द रूप जो योग है वह भाव लेश्या है ।६ गाथा ४६६-४६८ के विशेषार्थ में द्रव्य लेश्या का कथन विस्तार पूर्वक किया जा चुका है और ४. धवल पु. ७ मृ. १०५ १. धवल पु. १ पृ. ३६१। २. धवल पु. १ पृ. १९१। ३. धवल पु. १ पृ. १५०। ५. रा. वा. ४।२२१२-६ टिप्पण सहित । ६. रा. वा. ४।२२।१० ।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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